यह ब्लॉग खोजें

शुक्रवार, 28 फ़रवरी 2020

क्या अमित शाह देश की जनता को इन सवालों के जवाब देंगे

आज देश के जो हालात हैं  और हाल ही में दिल्ली में हुई हिंसा को देखने के बाद यह प्रश्न उठना स्वाभाविक ही है कि क्या माननीय गृहमंत्री अमित शाह अपने दायित्व को सही प्रकार से नहीं निभा पा रहे हैं? 

नागरिकता संशोधन कानून बनने के बाद से ही देश के हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं, और उधर भाजपा भी लगातार चुनाव हारती जा रही है। इन दोनों ही बातों का एक दूसरे से गहरा सम्बन्ध है। दरअसल जब तक भाजपा के चुनावी रणनीतिकार की कमान पूरी तरह से अमित शाह के हाथों में थी तब तक भाजपा एक बाद एक चुनाव जीत रही थी और देश के हालात भी लगभग सामान्य थे। लेकिन जबसे अमित शाह ने गृहमंत्रालय का पदभार सम्भाला है और चुनावी राजनीति छोड़ी है, न देश स्थिर है और न भाजपा। 

20 दिसम्बर को एकाएक पूरे देश में एक वर्ग विशेष के लोग सड़कों पर आ जाते हैं और पुलिस पर सीधे-सीधे हमला बोल देते हैं। लेकिन पुलिसकर्मियों के हाथ बंधे होने के कारण वह सीधे रूप से कोई कार्यवाही नहीं कर पाते, उसके बाद शाहीन बाग़ में धरने के नाम पर सड़कों को जाम कर दिया जाता है लेकिन पुलिस मूकदर्शक बनकर उन्हीं प्रदर्शनकारियों की रक्षा में जुट जाती है जो लगातार देश और पुलिस विरोधी नारे लगा रहे होते हैं।
उससे पहले जेएनयू और जामिया मिल्लिया इस्लामिया में छात्रों के हिंसक प्रदर्शन होते हैं। लेकिन वहां पर भी पुलिस ख़ामोश तमाशा देखती है।

दिल्ली में लगातार एक के बाद एक हिंसक झड़प होती हैं फिर भी पुलिस और सुरक्षा बल गांधी के तीन बन्दर बने रहते हैं, जिसका खामियाजा भुगतना पड़ा उस अंकित शर्मा को जिसे 400 बार चाकू से गोदा गया, उस रतनलाल को जो सिर्फ़ अपनी ड्यूटी निभा रहा था। और ऐसे ही तमाम लोगों को जिनका दंगे या दंगाइयों से कोई ताल्लुक नहीं था। 

3 दिन लगातार हिंसा का तांडव होता है लेकिन गृहमन्त्री और केन्द्र सरकार की नींद नहीं खुलती, क्यों?
क्या कारण है कि ताहिर हुसैन अपने घर को आतंक का अड्डा बना लेता है और ख़ुफ़िया विभाग को कानोंकान ख़बर भी नहीं होती?

क्या कारण है कि 20 दिसम्बर के वहशत के नंगे नाच के बावजूद भी सुरक्षा बलों को शूट एट साइट के आदेश नहीं दिए जाते?

क्या कारण है कि पूरे देश को शाहीन बाग़ बनाने की तैयारियों के बावजूद दिल्ली के शाहीन बाग़ पर कोई कार्यवाही नहीं की जाती है?

क्या कारण है कि ओवैसी बन्धुओं, वारिस पठान, जावेद अख्तर, स्वरा भास्कर, फैजुल हसन, कन्हैया कुमार, हार्दिक पटेल, उमर ख़ालिद, महमूद प्राचा, सोनिया गांधी, शुएब आलम जमाई, मणिशंकर अय्यर, मनीष सिसोदिया, शशि थरूर, रावण जैसे लोगों पर कोई कार्यवाही नहीं की जा रही है?

क्या कारण है कि पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया, एसडीपीआई, जमाते इस्लामी जैसे तमाम संगठनों  पर अभी तक प्रतिबंध नहीं लगाया जा रहा है?

ये और ऐसे कई और प्रश्न हैं जिनके जवाब देश की जनता जानना चाहती है और गृहमन्त्री अमित को उनके जवाब देने ही होंगे।

गुरुवार, 27 फ़रवरी 2020

नहीं तो हिन्दू, जो 700 वर्षों तक मुसलमानों के ग़ुलाम रहे, मुसलमानों को अपना ग़ुलाम मान लेंगे

महमूद प्राचा सहित कई नौटंकीबाज अक्सर टीवी डिबेट्स में अपने पीछे बाबा साहेब के पोस्टर लगाकर बैठते हैं, शाहीन बाग़ सहित तमाम CAA-NRC विरोध-प्रदर्शनों  में बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर के पोस्टर लेकर बैठा जा रहा है। उन्हीं बाबा साहेब ने अपनी पुस्तक "पाकिस्तान ऑर पार्टीशन ऑफ इंडिया" नामक पुस्तक में 1920 और '30 के दशकों में मुस्लिम नेताओं के राजनीतिक विचार औऱ व्यवहार को उजागर करने के लिए डॉ. अम्बेडकर ने अनेक महत्वपूर्ण मुस्लिम नेताओं के विचारों के उदाहरण दिए हैं. उनमें से कुल दो नेताओं के विचार यहां प्रस्तुत हैं।

मौलाना आज़ाद सोभानी ने सिल्हट में सन 1938 में एक बयान दिया था- 
"अंग्रेज धीरे-धीरे निर्बल होते जा रहे हैं और निकट भविष्य में हिंदुस्तान से चले जायेंगे। इसलिए, यदि हमने इस्लाम के सबसे बड़े शत्रु हिंदुओं से अभी से संघर्ष करके उन्हें कमज़ोर न किया, तो वे न केवल हिंदुस्तान में रामराज्य स्थापित कर देंगे, बल्कि धीरे-धीरे सारी दुनिया में फैल जाएंगे। यह हिंदुस्तान के 9 करोड़ (उस समय भारत में मुसलमानों की जनसंख्या) पर निर्भर है कि वे हिंदुओं को शक्तिशाली बनाएं या कमज़ोर। इसलिए, हर सच्चे मुसलमान का फ़र्ज़ है कि वह मुस्लिम लीग में शामिल होकर संघर्ष जारी रखे, ताकि हिन्दू यहां न जम पाएं और अंग्रेजों के जाते ही हिंदुस्तान के आज़ाद होने से  पहले ही हिंदुओं के साथ किसी न किसी प्रकार की समझदारी, ताक़त से या दोस्ताना अंदाज़ में क़ायम की जानी चाहिए, नहीं तो हिन्दू, जो 700 वर्षों तक मुसलमानों के ग़ुलाम रहे, मुसलमानों को अपना ग़ुलाम बना लेंगे"।

डॉ. सैफ़ुद्दीन किचलू ने 1925 में लाहौर में एक भाषण दिया था-
"यदि इस देश से ब्रिटिश राज हटाकर हम यहाँ स्वराज्य स्थापित करते हैं और अफगान या और कोई मुस्लिम भारत पर हमला करते हैं, तो हम मुसलमान इसका विरोध करेंगे और देश को आक्रमण से बचाने के लिए अपने सारे बेटों को कुर्बान कर देंगे। लेकिन, मैं एक बात का साफ-साफ ऐलान कर देना चाहता हूं। सुनो, मेरे हिन्दू भाइयों बहुत ध्यान सुनो! यदि आप लोग हमारे तंज़ीम आंदोलन में बाधा डालोगे और हमारे हक हमें नहीं दोगे तो हम अफगानिस्तान या दूसरी किसी मुस्लिम ताक़त से एकता कर लेंगे और इस देश में अपनी हुक़ूमत कायम कर लेंगे।"
 ( पाकिस्तान ऑर पार्टीशन ऑफ इंडिया, पृष्ठ 265-6)

श्रीमती एनी बेसेंट लिखती हैं : - 
"एक अन्य प्रश्न भारत के मुसलमानों के विषय में बारे में उठता है। यदि हिंदुओं और मुसलमानों के आपसी सम्बन्ध (सन 1916 के) लखनऊ समझौते के दिनों के जैसे रहते तो यह प्रश्न उतना आवश्यक न होता, यद्यपि स्वतंत्र भारत में कभी न कभी उठता अवश्य। परन्तु ख़िलाफ़त आंदोलन (सन 1919) के बाद से बहुत कुछ बदल गया है, और ख़िलाफ़त आंदोलन को प्रोत्साहन मिलने से भारत के लिए उत्पन्न हुए अनेक दुष्परिणामों में से एक यह है कि इस्लाम में विश्वास न रखने वालों के विरुद्ध मुसलमानों की घृणा की अंदरूनी भावना पूरी निर्लज्जता के साथ नग्न रूप में उभर आई है, जैसी कि वह बीते समय में थी। हमने सक्रिय राजनीति में तलवार के बल पर बढ़ने वाले इस्लाम के प्राचीन रूप को पुनर्जीवित होते देख लिया है।"

इन सब वक्तव्यों को पढ़ने के बाद आप क्या प्रतिक्रिया देंगे या आप क्या समझ पाए हैं यह हम आप पर छोड़ते हैं।

रविवार, 23 फ़रवरी 2020

बहनजी के सताए-रावण की शरण में आये

राजनीतिक गलियारों में ख़बर है कि "रावण" एक राजनीतिक पार्टी बनाने की कोशिशों में लगे हैं, और उनकी उन कोशिशों को वह सारे लोग सहारा देने में लगे हैं, जो "हाथी" से उतर गए या उतार दिए गए दूसरे शब्दों में कहिए तो जो नेता "बहनजी" के द्वारा सताए गए हैं, वह सब एक नए लेकिन मजबूत और टिकाऊ प्लेटफार्म पर आने की जुगत में लगे हुए हैं। इनमें कई दिग्गजों के नाम शामिल हैं। इन सबकी समस्या यह है कि इन्होंने एक लंबे समय तक दलित-मुस्लिम भाईचारे का चारा डालकर सत्ताएं हासिल की हैं। अब इन्हें वही पार्टी भायेगी जो दलित-मुस्लिम एकता का ढिंढोरा पीटे और सीधेतौर पर बहनजी को चुनौती दे सके। एक और दिक़्क़त यह भी है कि इस पार्टी का मुखिया भी कोई दलित चेहरा ही होना चाहिए, क्योंकि "जय भीम-जय मीम" का नारा तो हैदराबाद वाले "बैरिस्टर भाईजान" भी ख़ूब लगा रहे हैं, लेकिन उत्तर प्रदेश में उनकी दाल गलने वाली नहीं है, वह तो बस 15 करोड़ तक ही सीमित रह गए। बाकी के 100 करोड़ उन्हें घास नहीं डाल रहे, इसलिए उनके साथ इन दिग्गज़ों की पटरी नहीं बैठेगी।
अब ये "बहनजी हटाओ बिग्रेड" जो कि अपने को पीड़ित मान रही है, "रावण शरणम गच्छामि" की माला जप रही है। उधर कुछ ऐसे नेताओं का एक खेमा जिसे कोई और दल लेने को तैयार नहीं है, उसमें भी रावण को लेकर काफी जोशोखरोश है। उन्हें लगता है कि उनकी डूबती हुई राजनीति को केवल "रावण" ही बचा सकता है। हालांकि अभी तक इन लोगों में इस बात को लेकर संशय बना हुआ है कि "रावण" के साथ दलित वोट जुड़ेगा भी या नहीं, क्योंकि "हाथी" से मुकाबला करना कोई बाल-बच्चों का खेल तो है नहीं। इसी बात को लेकर अभी चिंतन-मनन चल रहा है।
कुल मिलाकर यह कहिए कि इस "रावण बिग्रेड" में शामिल होने वालों को ऐसे कहिए- इन्हें कोई ठौर नहीं, रावण को कोई और नहीं। फ़िलहाल अभी तो हमें इस तमाम क़वायद का कोई ठोस नतीजा निकलता नज़र नहीं आ रहा है, क्योंकि जो लोग इस बिग्रेड को तैयार करने में लगे हैं, उनमें ही इस  बिग्रेड की सफलता को लेकर सन्देह है और कई ऐसे सवाल हैं जिनका जवाब अभी भी उनके पास नहीं हैं।

शुक्रवार, 21 फ़रवरी 2020

हिंदुओं का यह विचार कि हिन्दू और मुसलमान एक राष्ट्र हैं, टिक नहीं पाता-बाबा साहेब अंबेडकर

 "यह निर्विवाद है कि भारतवर्ष के अधिकांश मुसलमान उसी जाति के हैं जिसके हिन्दू हैं। इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि सभी मुसलमान एक ही भाषा नहीं बोलते, और बहुत से तो वही बोलते हैं जो हिन्दू बोलते हैं। दोनों समुदायों में कई सामाजिक रिवाज़ भी एक समान हैं। यह भी सत्य है कि कुछ धार्मिक कृत्य व प्रथाएं दोनों समुदायों में एक से हैं। परंतु, प्रश्न यह है कि क्या इन सभी तत्वों से ही हिन्दू व मुसलमान एक राष्ट्र बन जाते हैं, या कि क्या इनसे उनमें एक दूसरे से जुड़ने की इच्छा पैदा हुई है?"
-डॉ आंबेडकर कृत "पाकिस्तान ऑर पार्टीशन ऑफ इंडिया" पृष्ठ 15

"पहली बात तो यह है कि दोनों समुदायों (हिन्दू-मुस्लिम) में जो समान विशेषताएं इंगित की जाती हैं वे दोनों समुदायों में सामाजिक ऐक्य स्थापित करने हेतु एक-दूसरे के तौर-तरीकों को अपनाने या उन्हें आत्मसात करने के लिए किए गए किन्हीं सचेतन प्रयासों का परिणाम नहीं है। सच्चाई यह है कि ये समानताएं कुछ अनसोचे कारणों का परिणाम है। कुछ तो ये धर्मांतरण की प्रक्रिया के अधूरी रह जाने से है। भारत जैसे देश में, जहां अधिकांश मुसलमान सवर्ण या असवर्ण हिंदुओं में से बनाये गए हैं, इन धर्मान्तरित लोगों का इस्लामीकरण न तो पूर्ण हो सका, न प्रभावी। इसका कारण, परिवर्तित व्यक्तियों द्वारा विद्रोह का भय भी हो सकता है अथवा धर्मांतरण के लिए मान जाने की स्थिति तक पहुंचाने का तरीका या मौलवियों की अपर्याप्त संख्या के कारण मज़हबी पाठ पढ़ाने में रह गई कमी भी हो सकती है। इसलिए कोई आश्चर्य नहीं कि मुस्लिम समुदाय के बहुत बड़े भाग अपने धार्मिक-सामाजिक जीवन में यहां-वहां अपने हिन्दूमूल को प्रकट कर देते हैं। और कुछ, यह सैंकड़ों वर्षों तक एक ही वातावरण में साथ रहने का भी प्रभाव है। समान वातावरण से समान प्रतिक्रियाएं पैदा होना अवश्यम्भावी है और उस वातावरण के प्रति एक ही प्रकार की प्रतिक्रिया देते-देते व्यक्तियों की एक सी किस्म बन ही जाती है। इनके अतिरिक्त, ये समान विशेषताएं बादशाह अकबर द्वारा आरम्भ किये गए हिन्दू-मुस्लिम धर्म-मज़हब के मेलजोल के भी अवशेष हैं। एक मृतप्रायः भूतकाल के, जिसका न वर्तमान है और न भविष्य".
-डॉ आंबेडकर कृत "पाकिस्तान ऑर पार्टीशन ऑफ इंडिया" पृष्ठ 15-16

 "जहां तक जातीय एकता, भाषाई एकता, औऱ एक ही देश में साथ रहने का तर्क है, यह मुद्दा एक दूसरे ही प्रकार का है। यदि ऐसी बातें राष्ट्र को बनाने या तोड़ने में निर्णायक होती हैं तो हिंदुओं का यह कथन ठीक होता कि जातीय, भाषाई और निवास की समानता के कारण हिन्दू व मुसलमान एक राष्ट्र हैं। ऐतिहासिक अनुभवों से तो यह स्पष्ट होता है कि न जाति, न भाषा और न ही एक देश में निवास किसी जनसमूह को एक राष्ट्र के सूत्र में पिरोने के  लिए पर्याप्त हैं".
-डॉ. अम्बेडकर कृत "पाकिस्तान ऑर पार्टीशन ऑफ इंडिया" पृष्ठ 16

 "क्या कोई ऐसा ऐतिहासिक घटनाक्रम है जिसे हिन्दू औऱ मुसलमान समान रूप से गौरव या व्यथा के विषय के रूप में याद रखे हुए हैं? समस्या की जड़ में यही प्रश्न है। यदि हिन्दू स्वयं को औऱ मुसलमानों को एक ही राष्ट्र का अंग मानना चाहते हैं, तो उन्हें इसी प्रश्न का उत्तर देना होगा। दोनों समुदायों के बीच सम्बन्धों के इस पक्ष पर दृष्टि डालें तो यही सामने आएगा वे तो बस एक-दूसरे से युद्ध में रत दो सेनाओं की भांति रहे हैं। उनके बीच किसी साझी उपलब्धि की प्राप्ति के लिए मिले-जुले प्रयासों का कोई युग नहीं रहा। उनका इतिहास एक-दूसरे के नाश का इतिहास है। जैसा कि भाई परमानन्द ने अपनी पुस्तिका "हिन्दू राष्ट्रवादी आंदोलन" में उल्लेख किया है, 'हिन्दू अपने इतिहास में पृथ्वीराज, प्रताप, शिवाजी और बन्दा बैरागी के प्रति श्रद्धा रखते हैं, जिन्होंने इस भूमि की रक्षा और सम्मान के लिए मुसलमानों से सँघर्ष किया; जबकि मुसलमान मुहम्मद बिन कासिम जैसे विदेशी हमलावरों और औरँगजेबों जैसे शासकों को अपना राष्ट्रनायक मानते हैं'। धार्मिक क्षेत्र में हिन्दू रामायण, महाभारत और गीता से प्रेरणा पाते हैं। दूसरी ओर, मुसलमान अपनी प्रेरणाएं कुरान और हदीस से प्राप्त करते हैं। अतः, जो बातें उन्हें एक सूत्र  में बांधती हैं, उनसे अधिक शक्तिशाली हैं वे बातें जो उन्हें बांटती हैं। हिंदुओं औऱ मुसलमानों के सामाजिक जीवन की कुछ विशेषताओं-समान जाति, भाषा व देश जैसी कुछ बातों पर निर्भर करके हिन्दू उन बातों को आधारभूत और महत्वपूर्ण मानने की गलती कर रहे हैं। जो केवल संयोगजनित और ऊपरी हैं। हिंदुओं और मुसलमानों को जितना ये तथाकथित समानताएं मिलाती हैं, उससे कहीं अधिक बांटती हैं, उनकी राजनीतिक और साम्प्रदायिक शत्रुताएं। दोनों समुदाय अपना अतीत यदि भूल पाते तो शायद संभावनाएं कुछ और होतीं".
-डॉ. अम्बेडकर कृत "पाकिस्तान ऑर पार्टीशन ऑफ इंडिया" पृष्ठ 17-18

"पर दुःख यह है कि दोनों समुदाय अपना भूतकाल न मिटा सकते हैं, न भुला सकते हैं। उनका भूतकाल उनके धर्म या मज़हब में स्थापित हुआ पड़ा है औऱ अपने भूतकाल को भूलना उनके लिए अपने धर्म को या मज़हब को त्यागने जैसा है। इसकी आशा करना व्यर्थ है। ऐतिहासिक समानताओं के अभाव में हिंदुओं का यह विचार कि हिन्दू और मुसलमान एक राष्ट्र हैं, टिक नहीं पाता इसी पर आग्रह करते रहना मानो मतिभ्रम में पड़े रहना है."
-डॉ. अम्बेडकर कृत "पाकिस्तान ऑर पार्टीशन ऑफ इंडिया" पृष्ठ 19

"मुसलमानों में हिंदुओं की दुर्बलताओं का अनुचित लाभ उठाने की भावना है। यदि हिन्दू किसी बात पर आपत्ति करते हैं तो मुसलमान उसी बात पर आग्रह करने की नीति बनाने लगते हैं, और यह आग्रह तभी छोड़ने को तैयार होते हैं जब हिन्दू उसके बदले किसी अन्य सुविधा के रूप में उसका मूल्य चुकाने को तैयार हो जाते हैं।"
-डॉ. अम्बेडकर कृत "पाकिस्तान ऑर पार्टीशन ऑफ इंडिया" पृष्ठ 259

गुरुवार, 20 फ़रवरी 2020

केंद्र सरकार NRC पर अपना रुख़ साफ़ क्यों नहीं करती

केंद्र सरकार ने नागरिकता संशोधन कानून को लागू करके निश्चित रूप से एक सराहनीय कदम उठाया है। लेकिन राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (NRC) पर अभी भी सरकार का रुख़ स्पष्ट नहीं हो पा रहा है। जबकि गृहमंत्री श्री अमित शाह ने लोकतंत्र के मंदिर  संसद भवन में NRC को पूरे देश में लागू करने की बात कही थी, हालांकि विपक्ष और मुस्लिम संगठनों के दबाव में आकर सरकार ने "till Now" शब्द लगाकर NRC के भविष्य पर एक प्रश्नचिन्ह अवश्य लगा दिया है।

मूल प्रश्न यह है कि यदि भाजपा की केंद्र सरकार NRC को अभी लागू करने की स्थिति में नहीं है तब उसपर भाजपा नेताओं विशेषतः अमित शाह ने बेवज़ह बयानबाजी क्यों की थी, और यदि देर-सबेर उसको लागू करना ही है तब आख़िर क्या कारण है कि अभी तक उसका कोई ड्राफ्ट तैयार नहीं किया गया? और न ही इस सम्बंध में कोई प्रस्ताव कैबिनेट में आ पाया है।
भारत का मुसलमान कथित तौर पर NRC से अपने आपको डरा हुआ महसूस कर रहा है, जिसके कारण पूरे देश में मुस्लिम संगठनों और उनके हिमायतियों द्वारा नफ़रत की आग लगाई जा रही है, जिसमें विपक्ष लगातार घी डालने का काम कर रहा है।
लेकिन इसके लिए केवल विपक्ष और मुस्लिम संगठनों को दोषी ठहराना पक्षपात होगा, क्योंकि हमारा मानना है कि देशभर में चल रही उहापोह की स्थिति के लिये केंद्र सरकार का दोगला रवैया भी काफ़ी हद तक जिम्मेदार है। 
केंद्र सरकार दोनों हाथों में लड्डू नहीं रख सकती, उसे यह स्पष्ट करना ही होगा कि NRC का वास्तविक उद्देश्य क्या है? और उससे भारत में रहने वाले अल्पसंख्यक समाज पर क्या विपरीत प्रभाव पड़ सकता है। केंद्र सरकार को चाहिए कि वह NRC के ड्राफ्ट को जल्द से जल्द तैयार करके संसद के सदन पटल पर रखे ताकि विपक्ष द्वारा फैलाई जा रही तमाम अफवाहों पर अंकुश लग सके, और यदि NRC लागू नहीं किया जाना है तो केंद्र सरकार उसे भी पूरी तरह से स्पष्ट करे।

बहरहाल, कुल मिलाकर  भाजपा को आरपार की कुश्ती तो लड़नी ही होगी।

-मनोज चतुर्वेदी "शास्त्री"

सोमवार, 17 फ़रवरी 2020

कुकुरमुत्ते की तरह उगते शाहीन बाग़ क्या भाजपा की कायरतावादी और दोगली नीति का परिणाम हैं

आज जनता यह जानना चाहती है कि जब शाहीन बाग़ में विरोध-प्रदर्शन की आड़ में दुर्योधन और दुशासन बने पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया और एसडीपीआई द्वारा आम जनता के अधिकारों का चीरहरण किया जा रहा है, तब श्री नरेन्द्र मोदी धृष्टराष्ट्र की तरह आंख बंद क्यों बैठे हैं? 

डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने अपनी पुस्तक "पाकिस्तान ऑर पार्टीशन ऑफ इंडिया" नामक पुस्तक में एक जगह लिखा है कि-

"कांग्रेस ने मुसलमानों को राजनैतिक और अन्य रियायतें देकर उन्हें सहन करने और खुश रखने की नीति अपनाई है। क्योंकि वे समझते हैं कि मुसलमानों के समर्थन बिना वे अपने मनोवांछित लक्ष्य स्वतंत्रता को पा नहीं खा सकते। मुझे लगता है कि कांग्रेस ने दो बातें समझी नहीं है। पहली तो यह कि तुष्टिकरण और समझौते में अंतर होता है, और यह एक महत्त्वपूर्ण अंतर होता है। तुष्टिकरण का अर्थ है, एक आक्रामक व्यक्ति या समुदाय को मूल्य देकर अपनी ओर करना, और यह मूल्य होता है उस आक्रमणकारी द्वारा किये गए, निर्दोष लोगों पर, जिनसे वह किसी कारण से अप्रसन्न हो, हत्या, बलात्कार,लूटपाट और आगजनी जैसे अत्याचारों को अनदेखा करना। दूसरी ओर, समझौता होता है- दो पक्षों के बीच कुछ मर्यादाएं निश्चित कर देना जिनका उल्लंघन कोई भी पक्ष नहीं कर सकता। तुष्टिकरण से आक्रांता की मांगों और आकांक्षाओं पर कोई अंकुश नहीं लगता, समझौते से लगता है. दूसरी बात, जो कांग्रेस समझ नहीं पाई है, यह है कि छूट देने की नीति ने मुस्लिम आक्रामकता को बढ़ावा दिया है; और, अधिक शोचनीय बात यह है कि मुसलमान इन रियायतों का अर्थ लगाते हैं हिंदुओं की पराजित मानसिकता और सामना करने की इच्छा-शक्ति का अभाव। तुष्टिकरण की यह नीति हिंदुओं को उसी भयावह स्थिति में फंसा देगी जिसमें मित्र देश हिटलर के प्रति तुष्टीकरण की नीति अपनाकर स्वयं को पाते थे".
-डॉ. अम्बेडकर कृत "पाकिस्तान ऑर पार्टीशन ऑफ इंडिया" पृष्ठ 260-1

आज CAA-NRC और NPR पर दिल्ली के शाहीन बाग़ में चल रहे धरना-प्रदर्शन की आड़ में जिस प्रकार से अराजकता और देशद्रोही मानसिकता का भौंडा प्रदर्शन किया जा रहा है, क्या उसे केंद्र की भाजपा सरकार द्वारा एक वर्ग विशेष के तुष्टिकरण की राजनीति के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। एक अनुमान के अनुसार इस विरोध-प्रदर्शन के कारण प्रतिदिन करीब 10 लाख लोगों का आम जनजीवन प्रभावित हो रहा है। लाखों लोगों के रोज़गार प्रभावित हो रहे हैं, विद्यार्थियों की शिक्षा पर बुरा प्रभाव पड़ रहा है, कई पटरी दुकानदारों की रोज़ी-रोटी छीन ली गई है। लेकिन इस सबके बावजूद केंद्र सरकार धृष्टराष्ट्र की तरह आंखें  बंद किये बैठी है।

दूसरी तरफ़ माननीय सर्वोच्च न्यायालय का रुख़ भी अचंभित करने वाला है, आख़िर क्या कारण है कि सबकुछ जानने और समझने के बावजूद कोर्ट ने अभीतक भी कोई स्पष्ट आदेश नहीं दिए हैं। बात-बात पर संविधान की दुहाई देने वाले प्रदर्शनकारी यह बताएं कि क्या उन लोगों के संवैधानिक अधिकार नहीं हैं जिन लोगों का आमजीवन इस प्रदर्शन के कारण प्रभावित हो रहा है।

आज प्रदर्शनकारी CAA-NPR-NRC को लेकर शाहीन बाग़ घेरे हुए हैं, क्या कल यही लोग "फ्री कश्मीर" का नारा लगाते हुए चांदनी चौक को नहीं घेरेंगे? कल यह भी हो सकता है कि ये लोग या इन जैसी विचारधारा के लोग केरल, हैदराबाद या फिर कोई और मुस्लिम बाहुल्य राज्य को "स्वतंत्र" करने की मांग लेकर संसद भवन को घेर लें.

आख़िर यह नई परिपाटी क्यों शुरू करने दी गई? क्यों इनपर सख़्ती नहीं की जा रही? क्या जानबूझकर इस अराजकतावादी विचारधारा को बढ़ावा दिया जा रहा है? कुकुरमुत्ते की तरह उगते यह शाहीन बाग़ क्या भाजपा की कायरतावादी और दोगली नीति का परिणाम हैं?


शनिवार, 15 फ़रवरी 2020

राजनीति में जज़्बातों के लिए कोई जगह नहीं होती

राजनीति में जज़्बातों के लिए कोई जगह नहीं होती, जज़्बात यानी भावनाएं। समझदार राजनीतिज्ञ वह होता है जो ख़ुद कभी भावनाओं में न बहे लेकिन हमेशा दूसरों की भावनाओं को भड़काता रहे। दूसरे शब्दों में राजनीति हमेशा दिमाग़ से होती है, दिल से नहीं। 
इस समय पूरे देश में जो कुछ हो रहा है वह राजनीति के इसी सिद्धान्त का एक हिस्सा है। एक और बात जो सबसे जरूरी है वह यह है कि राजनीति में कोई किसी का नहीं होता, सब अपने-अपने स्वार्थ के लिए लड़ते हैं।
लेकिन यह दोनों ही बातें न तो राहुल गांधी आजतक समझ सके और न ही अखिलेश यादव और तेजस्वी यादव ने कभी इस बात को समझने की कोशिश की।
दरअसल अखिलेश यादव, तेजस्वी यादव और राहुल गांधी दोनों ही लोग मुहं में चांदी की चम्मच लेकर पैदा हुए हैं, और इन तीनों को ही राजनीति विरासत में मिली है। अरविंद केजरीवाल, ममता बनर्जी, मायावती, शरद पवार, नीतीश कुमार और प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जैसे नेताओं ने ज़मीन से राजनीति की है। इसमें मुलायम सिंह यादव, लालू यादव औऱ शिवपाल यादव जैसे नाम भी शामिल हैं।

आज जो कुछ हो रहा है और जिस प्रकार के बचकाना बयान इन हवाई नेताओं विशेषकर राहुल गांधी जैसे नेताओं द्वारा दिये जा रहे हैं, वह कहीं न कहीं विपक्ष का राजनीतिक नुकसान ही कर रहे हैं।

विपक्ष की बचकाना राजनीति को अरविंद केजरीवाल ने जिस प्रकार अपने शपथ ग्रहण समारोह में श्री मोदी को बुलाकर करारा तमाचा मारा है, वह इस बात को साबित करने के लिए काफी है कि राजनीति में कोई किसी का नहीं होता।

राजनीति में न कोई धर्म होता है, न मज़हब, न जाति और न सम्प्रदाय बल्कि राजनीति में सत्ता ही सबसे बड़ा धर्म होता है। केजरीवाल ने दिल्ली जीतकर विपक्ष को अंगूठा दिखा दिया क्योंकि केजरीवाल जानते हैं कि उनकी सबसे बड़ी शत्रु कांग्रेस है। क्योंकि केजरीवाल जिस रणनीति पर काम कर रहे हैं उसी रणनीति के सहारे कांग्रेस ने इस देश पर 70 सालों तक Nएकछत्र राज किया है।

केजरीवाल इस वक्त हिन्दू सवर्ण (ब्राह्मण, वैश्य और क्षत्रिय) के साथ मुस्लिम समुदाय के लोगों औऱ झुग्गी-झोपड़ी में रहने वाले तमाम लोगों को एकजुट करके राजनीति कर रहे हैं। जबकि भाजपा दलित-पिछड़ा वर्ग की राजनीति कर रही है और राष्ट्रवाद के नाम पर मुस्लिमों को भी अपने पाले में करने का प्रयास करने में लगी है।

कांग्रेस अभी तक यह समझने में ही नाकाम है कि उसको किस वोटबैंक को साधने की परम आवश्यकता है। कभी वह जनेऊधारी ब्राह्मण बन जाती है, कभी कट्टरपंथी मुसलमानों और पाकिस्तान के साथ खड़ी हो जाती है, कभी दलितों के लिए प्रमोशन और सरकारी नौकरियों में आरक्षण पर शोर मचाती है और कभी पिछड़ों और आदिवासियों का रोना लेकर बैठ जाती है।
कुल मिलाकर देश में कांग्रेस और प्रदेश में सपा पूरी तरह से दिशाहीन हैं। और इसकी मुख्य वजह अखिलेश यादव और राहुल गांधी का अनुभवहीन होना है।


गुरुवार, 13 फ़रवरी 2020

गिरिराज सिंह द्वारा देवबंद पर दिए गए बयान को बेहद गम्भीरता से लिया जाना चाहिए

अभी हाल ही में केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने दारुल उलूम देवबंद पर एक बयान देते हुए कहा कि "देवबंद आतंक की गंगोत्री है" इस बयान के बचाव में दिए अपने एक दूसरे स्टेटमेंट में बीते बुधवार को उन्होंने कहा, 'देखिए कितने लोग देवबंद से आतंकी गतिविधियों में शामिल हुए हैं। दुर्भाग्य है इस देश का जो राष्ट्र के लिए काम करना चाहिए, वे राष्ट्र विरोधी..मैंने सही कहा कि देवबंद गंगोत्री है'.

व्यक्तिगत रूप से हम केंद्रीय मंत्री श्री गिरिराज सिंह का बहुत सम्मान करते हैं और यह मानते हैं कि देवबंद पर दिए गए उनके इस बयान को बेहद गम्भीरता से लिया जाना चाहिए, क्योंकि यह बयान कोई कोरा राजनीतिक बयान नहीं है, बल्कि इस बयान का सीधा सम्बन्ध देश की एकता, अखण्डता और सम्प्रभुता से जुड़ा हुआ है।

अगर इस बयान में लेशमात्र भी सच्चाई है तो उसकी उच्चस्तरीय जांच होनी चाहिये अन्यथा इस तरह की कोरी और भड़काऊ बयानबाजी से देश का माहौल बिगड़ने और दो सम्प्रदायों के बीच कड़वाहट बढ़ने की पूरी संभावना होती है।

*कट्टरपन्थ और आतंक दो अलग-अलग विषय हैं। हमारा मानना है कि प्रत्येक धार्मिक व्यक्ति को अपने धर्म, अपनी आस्था और अपने समाज के प्रति समर्पित होना चाहिए, जिसे आप कट्टरपन्थ कह सकते हैं। कट्टरपन्थ के कई रूप होते हैं, लेकिन जब कट्टरपन्थ अतिवादी और हिंसात्मक हो जाता है तो वह आतंक और आतंकी को जन्म देता है। दूसरे शब्दों में कहिए तो उग्र कट्टरपन्थ हमेशा आतंक को जन्म देता है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि हर कट्टरपंथी आतंकी ही होता है।*

मैं 37 सालों से मुसलमानों के बीच उठता- बैठता- खाता-पीता रहा हूँ, मेरी प्रारंभिक शिक्षा- दीक्षा मुस्लिम मुफ़्तालूम इंटर कालेज, चांदपुर में हुई है, और इस्लाम को मैंने बहुत गहराई से जानने और समझने की कोशिश की है, और मेरा मानना है कि मुसलमान एक ऐसी क़ौम है जो हुक़ूमत करना भी करना भी जानती है और फरमाबरदारी (आज्ञापालन) भी। इसलिये हर मुसलमान अपनी क़ौम के लिये एक बेहतरीन शासक भी होता है और एक वफ़ादार सिपाही भी होता है।

देवबंद किसी मुसलमान को आतंकवादी नहीं बनाता, ठीक उसी तरह जिस प्रकार  संघ (आरएसएस) की शाखाओं में जाकर कोई भी हिन्दू आतंकी नहीं बन जाता। अलबत्ता वह अपनी मातृभूमि, अपने धर्म और अपने हिन्दू समाज के प्रति जागरूक हो जाता है।

मंगलवार, 11 फ़रवरी 2020

दिल्ली में भाजपा की हार बनाम मोदी का गांधीवाद

आज दिल्ली में भाजपा की हार हो गई और आम आदमी पार्टी की जीत हुई। इसके लिए मैं अरविंद केजरीवाल और उनकी पूरी टीम के साथ-साथ तमाम दिल्लीवासियों को हार्दिक बधाईयां देता हूँ।

इस जीत और हार को लेकर प्रत्येक व्यक्ति का अपना-अपना दृष्टिकोण है। मेरा मानना है कि यह भाजपा के उस गांधीवाद की हार है जो "सबका विश्वास" साथ लेकर चलने की बात करता है, और जिसने "सबका विश्वास" जीतने के चक्कर में अपनों का ही विश्वास खो दिया है। 

मैंने दिल्ली चुनाव को बहुत करीब से देखा है, और पिछले तकरीबन एक माह से मैं भाजपा के कई दिग्गजों के साथ बातचीत करता रहा हूँ।

और मैंने महसूस किया कि कहीं न कहीं भाजपा को यह खुशफ़हमी हो चली है कि हिन्दू वोट उसका जरखऱीद ग़ुलाम बन गया है  औऱ हिंदुत्व या राष्ट्रवाद के नाम पर उसे वोट देना उसकी मजबूरी बन गई है। 

CAA-NRC की आड़ में जिस प्रकार से पिछले दो माह में कुछ देश विरोधी ताक़तों के द्वारा पूरे देश में हिंसा और अराजकता का माहौल बनाया गया और हमारी केंद्र सरकार गांधीवादी दर्शन की दुहाई देते हुए अप्रत्यक्ष रूप से उन अराजकतावादी ताक़तों की हौंसला अफ़जाई करती रही वह हमारी समझ से बिल्कुल परे है। 

2019 चुनाव से पहले भाजपा ने कहीं न कहीं हिंदुओं को यह आश्वासन देने का प्रयास किया था कि अगर वह उसे पूर्ण बहुमत से जिता देते हैं तो वह उनकी सुरक्षा की गारंटी लेगी। हिंदूओं ने उन्हें अपना पूर्ण बहुमत देकर गद्दी पर बैठा दिया, लेकिन जिस प्रकार 20 दिसम्बर 2019 को पूरे देश में हिंसा का तांडव खेला गया और पुलिस प्रशासन पर सीधे अटैक किया गया, औऱ उस सबके बावजूद मोदी और उनके मंत्री गांधीवाद का राग अलापते रहे, उससे आम जनता के मन में अपनी और अपने परिवार की सुरक्षा को लेकर भय की भावना ने जन्म ले लिया। ओवैसी बन्धुओं, शरजील इमाम, फैजुल हसन, कन्हैया कुमार, अमनुतुलल्ला खान, शुएब इक़बाल सहित जेएनयू, एएमयू और जामिया के छात्रों द्वारा जिस प्रकार की देशविरोधी, समाजविरोधी और हिन्दुविरोधी बयानबाजी हुई, राष्ट्रीय चैनलों पर विपक्ष के प्रवक्ताओं खासतौर से राजेश वर्मा, प्रेम कुमार, शुएब जमाई और वारिस पठान जैसों ने खुलेआम धमकियां दीं, राष्ट्रीय चैनलों के प्रतिनिधियों पर हमले किये गए ,उसका जवाब में भाजपा के नेता केवल "ईश्वर अल्लाह तेरो नाम, सबको सन्मति दे भगवान" का भजन कीर्तन करते रहे लेकिन कार्यवाही नहीं की गई। और तो और दिल्ली में एक शाहीन बाग़ को रोकने के बजाय भाजपा ने एक गाल पर थप्पड़ खाकर दूसरा गाल आगे करने की गांधीवादी नीति का अनुसरण करते हुए जिस प्रकार अप्रत्यक्ष रूप से पूरे देश को शाहीन बाग़ बनाने की सहमति प्रदान की, उससे आम जनता में न केवल खौफ़ पैदा हुआ बल्कि असुरक्षा की भावना भी घर कर गई।

*आख़िर क्या कारण है कि अभी तक भी पीएफआई, एसडीपीआई और तमाम ऐसे संगठन जो देश में अराजकता फैला रहे हैं, को प्रतिबंधित नहीं किया जा रहा है? कन्हैया कुमार, उमर खालिद, शरजील इमाम जैसे देशद्रोही बयानबाजों को सींखचों के पीछे नहीं डाला जा रहा है? सर्वोच्च न्यायालय की फटकार के बावजूद शाहीन बाग़ के आयोजन पर सख़्ती के साथ रोक क्यों नहीं लगाई जा रही? उन भाजपा नेताओं पर भी कोई कार्यवाही क्यों नहीं की जा रही जो उलटे-सीधे बयान देकर जनता की भावनाओं को भड़काने की कोशिश में लगे रहते हैं? क्या कारण है कि ओवैसी बन्धुओं को "कुछ भी" कहने की छूट दे रखी है? जो लोग खुलेआम देश के प्रधानमंत्री और गृहमंत्री के लिए अपशब्दों और धमकी भरे शब्दों का इस्तेमाल कर रहे हैं, उनके ख़िलाफ़ सख़्ती क्यों नहीं की जा रही है? आख़िर कब तक आप गांधीवाद की चादर ओढ़कर जनता से मुहं छिपाते फिरेंगे??*

मोदी जी, आपको जनता ने बैलेट दिया है, अब बुलेट चलाने की जिम्मेदारी आप और आपकी सरकार की है। अगर आगे भी आप यही गांधीवाद की दोगली नीति अपनाए रहे तो भाजपा यह समझ ले कि जिस जनता ने अर्श पर बैठाया है वह फर्श पर भी पटक सकती है। इसकी शुरूआत देश की राजधानी से हो चुकी है।

*-मनोज चतुर्वेदी "शास्त्री"*

कभी किंग कहलाने वाली कांग्रेस आज किंगमेकर बनने को तरस रही है

दिल्ली चुनाव परिणाम आ गए हैं और केजरीवाल पुनः मुख्यमंत्री बनने को तैयार हैं। 
भाजपा के लिए यह चुनाव एक प्रयोग की तरह था, जिसमें वह काफी हद तक सफल हो गई है। 
भाजपा का एक ही लक्ष्य है "कांग्रेस मुक्त भारत", या यूं कहिए कि वह 70 सालों के उस मिथक को पूरी तरह से ख़त्म कर देना चाहती है जो यह समझता है कि इस देश को केवल कांग्रेस ही चला सकती है। कांग्रेस लगातार अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार रही है। 15 सालों तक दिल्ली में एकछत्र राज करने वाली कांग्रेस आज शून्य पर आ गई है। कल तक "किंग" कहलाने वाली कांग्रेस आज "किंगमेकर" बनने के लिए भी तरस रही है।

मैं पूरे होशोहवास में दावे के साथ कह सकता हूँ कि दिल्ली चुनावों के परिणामों के बाद "एं tuटी भाजपा कम्युनिटी" (भाजपा और संघ से नफ़रत करने वाले) अब अरविंद केजरीवाल को अपने प्रधानमंत्री के रूप में देखना शुरू कर देगी, औऱ यही भाजपा चाहती है।

 भाजपा के लिए आप, सपा, बसपा, टीएमसी, एनसीपी, शिवसेना या कोई भी क्षेत्रीय पार्टी चुनौती पेश नहीं कर सकती। लेकिन कांग्रेस और वामपंथ उसके लिये बड़ी चुनौती हैं। जिनमें से वामपंथी विचारधारा तो पूरी तरह से जेएनयू तक सिमट कर रह गई है और अब कांग्रेस को जनता धीरे-धीरे नकारने लगी है। सच तो यह है कि नेहरू खानदान के इकलौते चश्मे चिराग़ आली जनाब राहुल गांधी साहब ख़ुद कांग्रेस की नैया डुबोने की रेस में सबसे आगे हैं। प्रियंका गांधी कोई भी अतिरिक्त जोख़िम उठाने वाली स्थिति में नहीं दिखाई दे रही हैं, वैसे भी सही मायने में प्रियंका गांधी के लिए यही कहा जा सकता है- हुजूर आते आते बहुत देर कर दी।

आज कांग्रेस पूरी तरह से नेतृत्वविहीन हो चुकी है, जबकि भाजपा के पास नितिन गडकरी, अमित शाह, सहित कई चेहरे हैं जिनमें योगी आदित्यनाथ एक बेहद युवा चेहरा हैं। जिनके पास नेतृत्व क्षमता के साथ-साथ राजकाज का अनुभव भी है।

अभी तो मोदी भी युवा ही हैं, और इस देश की जनता को मोदी से अभी बहुत अपेक्षाएं और आशाएं हैं। लेकिन भाजपा के नेताओं को यह समझने और मंथन करने की महती आवश्यकता है कि किस प्रकार से ब्राह्मण समाज को अपने साथ जोड़कर रखा जाए क्योंकि यही एक समाज ऐसा है जो कभी भी, कहीं भी और किसी का भी तख्तापलट करवा सकता है। उदाहरण के लिए आप राजस्थान और मध्यप्रदेश देख सकते हैं। 

यहां यह उल्लेखनीय है कि अरविंद केजरीवाल इन्हीं ब्राह्मणों की देन हैं, ममता बनर्जी खुद ब्राह्मण हैं, और अब बहन मायावती का भी झुकाव ब्राह्मणों की ओर बढ़ रहा है। जहां तक दलित और पिछड़े वर्ग की बात है तो उसे साधने में मोदी सरकार ने अभीतक तो कोई कोताही नहीं की है। आगे की राम जानें।
जय श्रीराम

*-मनोज चतुर्वेदी "शास्त्री"*

रविवार, 9 फ़रवरी 2020

राष्ट्रवाद : हिन्दू राष्ट्रवाद बनाम मुस्लिम राष्ट्रवाद

राष्ट्रवाद की भावना कई तत्वों से मिलकर बनती है हालांकि यह आवश्यक नहीं है कि प्रत्येक राष्ट्र में यह सभी तत्व विद्यमान हों। राष्ट्र  को सुदृढ करने वाले मुख्य तत्व हैं-भौगोलिक एकता, जातीय एकता, विचारों या आदर्शों की एकता या समान संस्कृति, भाषा की एकता, धर्म की एकता तथा विदेशी शासन से मुक्ति। एक मनुष्य समूह का राष्ट्रवाद दूसरे मनुष्य समूह के राष्ट्रवाद से भिन्न होता है।

 स्वतंत्रता से पूर्व भारत में हिन्दू समुदाय और मुस्लिम समुदाय राष्ट्रवाद का अभिप्राय विदेशी शासन से मुक्ति प्राप्त करना था। किंतु स्वंतत्रता प्राप्ति के पश्चात इन दोनों समुदायों के लिए राष्ट्रवाद का अभिप्राय बदल गया है। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात भारत में दो प्रकार की राष्ट्रवादी विचारधाराओं ने जन्म लिया, एक-मुस्लिम राष्ट्रवाद औऱ दूसरा हिन्दू राष्ट्रवाद।

हिंदू राष्ट्रवाद का अभिप्राय  हिन्दू संस्कृति, सभ्यता, भाषा एवं हिंदुत्व की विचारधारा में निष्ठा रखना तथा महाराणा प्रताप, वीर शिवाजी, जैसे महान हिन्दू योद्धाओं के विचारों और आदर्शों का पालन करते हुए एक सुगठित, सुसंस्कृत और सभ्य राष्ट्र का  निर्माण करना है, जिसे आप "हिन्दू राष्ट्र" पुकारते हैं।

जबकि दूसरी ओर मुस्लिम राष्ट्रवाद से अभिप्राय उस राष्ट्रवाद से है जो भारत को दारुल हरब के रुप में देखता रहा है, और वर्षों से इसे दारुल इस्लाम बनाने के प्रयास में निरन्तर लगा हुआ है जिसे आप "इस्लामिक राष्ट्र" पुकार सकते हैं। यह बाबर और तैमूर को अपना आदर्श मानते हैं, औऱ सदैव उनकी विचारधाराओं से प्रभावित रहते हैं।

यहां यह उल्लेखनीय है कि हिन्दू और मुस्लिम दोनों ही भारत को अपना देश मानते हैं, और इस पर अपना एकाधिकार बनाये रखने का प्रयास भी करते हैं। देशभक्ति और राष्ट्रवाद दोनों ही समुदायों (हिन्दू-मुस्लिम) में है, लेकिन दोनों के लिए उसके मायने अलग-अलग हैं। 
जबकि एक सच्चे भारतीय के लिए राष्ट्रवाद का अभिप्राय राष्ट्रीय एकता में निष्ठा रखना तथा जाति, धर्म , प्रान्त आदि के संकीर्ण दायरों से ऊपर उठकर भारतवर्ष की चतुर्मुखी, आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक और सांस्कृतिक उन्नति का प्रयास होना चाहिए। सही मायने में राष्ट्रवाद एक ऐसी विचारधारा का नाम है, जो लोगों को एक राष्ट्र के रूप में जोड़ता है, जो लोगों के आपसी रिश्तों को मधुर बनाता है, न कि एक ऐसी विचारधारा जो लोगों के आपसी रिश्तों में खटास लाता है।


शनिवार, 8 फ़रवरी 2020

शाहीन बाग़ : भाजपा के गले हड्डी

आज 8 फरवरी है, यानी दिल्ली चुनाव में मतदान की तारीख, आज दिल्ली के मतदाता सभी पार्टियों का भाग्य ईवीएम में बंद कर देंगे। लेकिन हमें इसमें कोई दिलचस्पी नहीं है कि चुनाव कौन जीतेगा, बल्कि यह देखना ज़्यादा दिलचस्प होगा कि शाहीन बाग़ की जनता के भाग्य में अभी और कितने दिन रास्ते बदलकर सफ़र करना लिखा है?, कब तक बच्चे अपने घरों पर बैठे रहेंगे?, कब तक एम्बुलेंस रोकी जाती रहेंगी?, कब तक लोग अपने व्यापार, अपनी रोजी-रोटी के साधनों को बर्बाद होते देखते रहेंगे?

यह भी देखना है कि शाहीन बाग़ का धरना किस या किन पार्टियों द्वारा प्रयोजित किया गया है, साथ ही यह भी देखना होगा कि केंद्र सरकार और नई दिल्ली सरकार इस धरने से कैसे निपटती हैं? क्योंकि दिल्ली सरकार बनते ही पुलिस-प्रशासन केंद्र सरकार के हाथों में आ जायेगा, हालांकि अभी तक यह चुनाव आयोग के दिशा-निर्देशों का पालन कर रहा है।

अब देखना यह है कि मोदी सरकार गांधीवाद को अपनाएगी यानी बातचीत के ज़रिए मसले को हल करने का प्रयास करेगी, अथवा इंदिरा गांधी के पदचिन्हों का अनुसरण करते हुए, "डंडा तंत्र" द्वारा इसको खाली करवाने का प्रयास करेगी।

वैसे *अगर सच्चाई देखी जाए तो अब शाहीन बाग़ भाजपा के गले में हड्डी की तरह फंस गया है, न निगले बन रहा है और न ही उगले। क्योंकि अगर भाजपा CAA पर एक भी कदम पीछे हटाती है तो उसके लिए यह थूककर चाटने वाली स्थिति होगी क्योंकि भाजपा के दिग्गज नेता और देश के गृहमंत्री श्री अमित शाह सार्वजनिक रुप से यह बयान दे चुके हैं कि "नागरिकता संशोधन क़ानून पर केंद्र सरकार एक इंच भी पीछे नहीं हटेगी"। कदम पीछे हटाते ही पूरे देश में ही नहीं वरन पूरी दुनिया में भाजपा की किरकिरी हो जाएगी और देश के 100 करोड़ हिंदुओं के साथ-साथ पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश के अल्पसंख्यक समुदायों का विश्वास भी भाजपा से उठ जाएगा। और यदि वह अपनी बात पर अड़ी रहती है तो शाहीन बाग़ को खाली कराना उसके लिए लोहे के चने चबाने जैसा होगा। क्योंकि अभी तक जो हमारा तजुर्बा रहा है, वह यही कहता है कि मोदी जी गांधीवाद को नहीं छोड़ेंगे, और शाहीन बाग़ जिन्नावाद से पीछे नही हटेगा।

शुक्रवार, 7 फ़रवरी 2020

B.R अंबेडकर का यह बयान चन्द्रशेखर उर्फ रावण जैसों की आंख खोलने के लिए काफी है

"मैं अनुसूचित जाति के उन  लोगों को, जो इस समय पाकिस्तान में फंसे हुये हैं, यह कहना चाहता हूं कि वह  भारत आ जाएं। दूसरी बात मैं यह कहना चाहता हूं कि अनुसूचित जाति के लोग, चाहे वह पाकिस्तान में हों या हैदराबाद में, मुसलमानों या मुस्लिम-लीग पर विश्वास न करें, यह उनके लिए घातक होगा। अनुसूचित जाति के लोगों में मुसलमानों को अपना हितैषी मानने की आदत सी बन गई है, केवल इसलिए कि उनके मनों में हिंदुओं के प्रति रोष है। यह दृष्टिकोण उचित नहीं है".
( धनजंय कीर कृत 'अम्बेडकर : जीवन और लक्ष्य', पृष्ठ 498) (ब्लिट्ज़ 24 अप्रैल, 1993 में उद्धत)

पाकिस्तान बनने के कुछ समय पश्चात ही हिंदुओं को बलात मुसलमान बनाने के समाचार जब बाबा साहेब को मिले तब बाबा साहेब अधीर हो उठे थे। उस वक्त उन्होंने (अम्बेडकर ने) पाकिस्तान सरकार की भर्त्सना करते हुए यह वक्तव्य निर्गत किया था. 

यह बयान उन तमाम लोगों को जरूर पढ़ना औऱ समझना चाहिये जो लोग हाथों में बाबा अम्बेडकर साहेब की तस्वीर लेकर नागरिकता संशोधन कानून (CAA) का विरोध कर रहे हैं, विशेषतः बाबा साहेब अंबेडकर के नाम पर राजनीति करने वाले चंद्रशेखर उर्फ रावण सहित समस्त दलित नेता जो कि बाबा साहेब को अपना आदर्श मानते हैं, यह बयान उन सभी लोगों के लिए भी एक बेहतर उदाहरण है जो कि "जय भीम-जय मीम" के नारे लगाते हुए उन लोगों का समर्थन कर रहे हैं जो कानून हाथ में लेकर भी अपने को संविधान का रक्षक बताने से नहीं चूकते।
इस बयान के बाद भी यदि आपकी आंख नहीं खुलतीं तो इसका अर्थ है कि आपने बाबा साहेब के विचारों, उनके सिद्धान्तों और उनके मार्गदर्शन को गम्भीरता से नहीं लिया है।

बुधवार, 5 फ़रवरी 2020

हिन्दू भारत बनाम मुस्लिम भारत: भाग-2

गतांक से आगे......

शायद बहुत कम लोग जानते हैं कि पाकिस्तान के क़ायदे-आज़म मौहम्मद अली जिन्ना एक बेहद सेक्युलर इंसान थे। और इस बात का अंदाजा आप इस बात से लगा सकते हैं कि डॉ. सरोजिनी नायडू ने जिन्ना को "हिन्दू-मुस्लिम एकता का राजदूत" कहा था। इसी जिन्ना ने उस समय के मुसलमानों के सबसे आंदोलन "ख़िलाफ़त आंदोलन" में भाग लेने पर यह कहकर गांधी जी का विरोध किया था कि यह मज़हबी मसला है और इसमें राजनीति का दख़ल उचित नहीं। बाद में यही जिन्ना पाकिस्तान का जनक बन गया और इसी शख़्स के कहने पर मुस्लिम लीग ने कलकत्ता में "डायरेक्ट एक्शन दिवस" मनाया था जिसमें लाखों हिंदुओं की नृशंसता पूर्वक हत्या हो गई थी।
यह भी शायद कम लोगों को मालूम है कि गांधी और जिन्ना दोनों के विचार एकदूसरे से बिल्कुल नहीं मिलते थे, यहाँ तक कि जिन्ना ने गांधी के असहयोग आंदोलन से भी असहमति दर्शाई थी।

टू नेशन थ्योरी का सिद्धांत जिन्ना ने नहीं बल्कि सर सय्यद अहमद खान ने 1867 में दिया था, पाकिस्तान शब्द भी जिन्ना ने नहीं दिया बल्कि रहमत अली ने दिया था। अल्लाहमा इक़बाल जिन्ना से सहमत नहीं थे लेकिन हिन्दू और मुसलमानों के लिए अलग-अलग क्षेत्रों की मांग जरूर उन्होंने रखी थी।पर वह भारत के विभाजन के पक्ष में नहीं थे।

आजकल जिसे देखो जिन्ना बनने की कोशिश में लगा है, चाहे ओवैसी बन्धु हों, चाहे शरजील इमाम हो, चाहे फैजुल हसन हो, चाहे अमनुत्तल्ला खान हों या फिर कोई और।

जिन्ना बनने के लिए बेहद शातिर और एक खास रणनीति की आवश्यकता होती है, जिन्ना ने कुछ भी नहीं पकाया था बल्कि उसने पके-पकाए को खाना शुरू कर दिया था।

आज जो लोग मुसलमानों के रहनुमा बनने की पुरज़ोर कोशिश कर रहे हैं, वह लोग केवल मुग़ालते में जी रहे हैं।  क्योंकि खुद मुसलमान ही किसी को जिन्ना बनाने की कोशिश में नहीं है। पूरे भारत का मुसलमान यह जानता है कि इस्लाम खतरे में नहीं है और न ही हो सकता है। मुसलमानों को यह भी पता है कि नागरिकता संशोधन कानून से उनकी खुद की नागरिकता को कोई खतरा नहीं है। अलबत्ता इतना ज़रूर है कि NRC को लेकर उनके मन में थोड़ा बहुत खौफ़ है लेकिन उसके लिए उनके पास काफी वक्त और तमाम दरवाजे हैं जिनपर जाकर वह अपनी आवाज़ उठा सकते हैं।

लेकिन दिक़्क़त उन लोगों को ज़्यादा हो रही है जो मुसलमानों के रहनुमा बनने या कहिए कि जिन्ना बनने की कोशिशों में लगे हैं। फिलहाल सबसे ज्यादा दर्द उन्हीं को हो रहा है। अगर मोदी-शाह अपने सीने चीरकर भी इन्हें दिखला दें तो भी यह विश्वास नहीं करने वाले क्योंकि यह चाहते ही नहीं कि यह मुद्दा खत्म हो।

क्रमशः

-मनोज चतुर्वेदी "शास्त्री"

Please visit

Https://www.shastrisandesh.co.in

मंगलवार, 4 फ़रवरी 2020

मुसलमान इस देश की आज़ादी के लिए लड़ रहा था या उसपर वापस अपना कब्ज़ा जमाने के लिये

1947 से लेकर आज तक भारत का मुसलमान और उसके पैरोकार यही शोर मचाते रहते हैं कि भारत की स्वतंत्रता में मुसलमानों का बहुत बड़ा योगदान है।

हाल ही में अकबरुद्द्दीन ओवैसी ने कहा था कि भारत पर हमने 800 साल हुक़ूमत की है, यह बात अकेले ओवैसी ही नहीं कह रहे हैं बल्कि इस देश का लगभग हर मुसलमान यही वाक्य दोहराता है। यानी हम यह मान लें कि अंग्रेजों से पहले इस देश में मुगलों की हुक़ूमत थी, और मुग़लवंशियों को भारत का मुसलमान अपना वंशज मानता है। ज़ाहिर है कि अंग्रेजों से पहले इस देश में मुसलमानों की ही हुक़ूमत थी। उसके बाद अंग्रेज आ गए, यानी इस देश का हिन्दू-बौद्ध-जैन-सिक्ख तो मुसलमानों और अंग्रेजों के ग़ुलाम ही माने जाने चाहिए।

इसका अर्थ यह हुआ कि अंग्रेजों से जो मुसलमान लड़ रहे थे वह इस देश को स्वतंत्र कराने के लिए नहीं लड़ रहे थे, बल्कि उसे फिर से वापस अपने कब्जे में लेने के लिए लड़ रहे थे। दूसरे शब्दों में कहें तो एक आक्रमणकारी, दूसरे आक्रमणकारी से अपनी सत्ता को वापस पाने के लिए लड़ रहा था। 

*कई इतिहासकारों के अनुसार 1857 का जो गदर हुआ था, वह मुसलमानों द्वारा सत्ता वापसी के लिए किया गया ज़िहाद था, जबकि हिन्दू-बौद्ध-सिक्ख और जैन समाज के द्वारा किया गया स्वतंत्रता संग्राम था।*

*क्योंकि अपनी स्वतंत्रता के लिए सही मायने में कोई जद्दोजहद कर रहा था तो वह था इस देश का हिन्दू-बौध्द, जैन और सिक्ख। वास्तव में स्वतंत्रता के लिए जद्दोजहद करने की जरूरत तो हिंदुओं को तभी से पड़ी होगी जबसे इस देश में मुसलमान आक्रांता के रूप में भारत आये थे यानी 711 ईसवी के बाद से हिन्दू अपनी धरती पर आए विदेशी आक्रमणकारियों से लड़ता चला आ रहा है।*

इस कड़वे सत्य को वामपंथी इतिहासकारों ने बहुत ही खूबसूरती के साथ छिपा लिया, औऱ ऐसा दिखाया कि मानो यह देश आदिकाल से ही हिन्दू-मुस्लिम समुदाय का था, जबकि सच यह है कि 711 से पहले इस देश में इस्लाम नहीं था, 1600 से पहले कोई ईसाई नहीं था।

सिक्ख, बौद्ध, जैन तो कोई धर्म ही नहीं हैं, बल्कि यह तो केवल मत हैं, जो सनातन हिन्दू धर्म की शाखाएं हैं। इस देश में केवल चार धर्म हैं, हिन्दू-इस्लाम-पारसी और ईसाई। जिनमें से इस्लाम, पारसी और ईसाई विदेशी धर्म हैं।

इसपर ज्यादा गहराई से जानने के लिए आप बाबा अम्बेडकर द्वारा 1941 में लिखित पुस्तक "थॉट्स ऑन पाकिस्तान" या उसका दूसरा संस्करण "पाकिस्तान ऑर पार्टीशन ऑफ इंडिया" जो कि 1945 में लिखी गई जरूर पढ़ें। आपके दिमाग़ के सारे ढक्कन खुल जाएंगे।