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पाश-तत्त्व : बंधन, संस्कार और साधना-सूत्र

 अध्याय–3


(शुद्ध शास्त्रीय, संस्कृत-उद्धरणों सहित ग्रन्थीय विवेचन)

सनातन दर्शन में पाश को प्रायः ‘बंधन’ कहकर संकुचित कर दिया जाता है, जबकि शास्त्रीय दृष्टि में पाश अज्ञान-बंधन नहीं, बल्कि चेतना-सम्बन्ध (Bond of Consciousness) है। श्रीगणेश के हस्त में पाश का अर्थ है—जीवन-ऊर्जा को उद्देश्य, अनुशासन और साधना से जोड़ना।

आगमिक परंपरा का मूल वाक्य है—

पाशबद्धो भवेज्जीवः पाशमोक्षाय साधनम् (शैव-आगम, तत्त्व-वाक्य)
अर्थात् जीव पाश से बंधा है; किंतु वही पाश मोक्ष का साधन भी बनता है।

संस्कृत में पाश के बहुविध अर्थ हैं—बन्धन, ग्रन्थि, आकर्षण, संस्कार-सूत्र. इसलिए पाश का निषेध नहीं, परिष्कार शास्त्रीय लक्ष्य है।

बृहदारण्यक उपनिषद् कहता है—

यथाकर्म यथाश्रुतं मनुष्यः भवति (बृहदारण्यक उपनिषद् 4.4.5)

यह यथाकर्म और यथाश्रुत—दोनों संस्कार-पाश के ही रूप हैं, जो जीव को उसके पथ पर अग्रसर करते हैं।

भगवद्गीता पाश को संग के रूप में विवेचित करती है—

सङ्गात् संजायते कामः कामात् क्रोधोऽभिजायते (गीता 2.62)
यह चेतावनी है—यदि पाश अविवेकपूर्ण है, तो पतन का कारण बनता है। 

परंतु गीता आगे समाधान भी देती है—

यः सङ्गं त्यक्त्वा कर्माणि करोति न लिप्यते (गीता 5.10)
अर्थात् पाश छोड़ा नहीं जाता, उसमें लिप्ति छोड़ी जाती है। यही पाश-तत्त्व का सनातन रहस्य है।

शास्त्र कहते हैं—मनुष्य बिना बंधन जीवित नहीं रह सकता। वह या तो निम्न वासनाओं से बंधता है, या उच्च लक्ष्य से।

योगसूत्र कहता है—

अभ्यासवैराग्याभ्यां तन्निरोधः (योगसूत्र 1.12)
यहाँ अभ्यास स्वयं एक पाश है—नित्य साधना का, लक्ष्य का, अनुशासन का।
अतः पाश = साधना-सूत्र।

यहाँ अध्याय-1अध्याय–2 और अध्याय–3 का संगम होता है।

पाश दिशा देता है अंकुश सीमा देता है. यदि केवल पाश हो—तो साधक आसक्ति में फँस जाता है। यदि केवल अंकुश हो—तो साधक निष्क्रिय हो जाता है। इसीलिए श्रीगणेश दोनों धारण करते हैं।

ऋग्वैदिक संकेत है—

ऋतेन दीक्षामाप्नोति दीक्षया दक्षमाप्नोति (ऋग्वेद परंपरागत भाव)
नियम (अंकुश) और दीक्षा/समर्पण (पाश)—दोनों से ही दक्षता उत्पन्न होती है।

आधुनिक मनोविज्ञान जिसे Attachment System कहता है, शास्त्र उसे पाश कहते हैं। सनातन दृष्टि कहती है—लगाव का उच्छेद नहीं, उन्नयन करो।
निम्न पाश ⇒ वासना
उच्च पाश ⇒ साधना

अतः पाश-तत्त्व का निष्कर्ष स्पष्ट है—पाश बंधन नहीं, सम्बन्ध है. सम्बन्ध पतन का नहीं, प्रगति का माध्यम बन सकता है. मोक्ष पलायन नहीं, परिष्कृत बंधन की अवस्था है

श्रीगणेश का पाश कहता है—

जिससे तुम बंधे हो, वही तुम्हें मुक्त भी कर सकता है—यदि उसे विवेक से थामो।
👉अध्याय–4 में अंकुश–पाश का संयुक्त दर्शन — सनातन संतुलन-सिद्धांत में हम दोनों तत्त्वों को एक समन्वित शास्त्रीय सिद्धांत के रूप में स्थापित करेंगे—जहाँ सन्यास और संसार, निग्रह और प्रवृत्ति, वैराग्य और कर्म—एक-दूसरे के विरोधी नहीं, पूरक सिद्ध होंगे।

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