एक वैचारिक कॉलम
भारत में मजहबी कट्टरपंथ को यदि किसी एक कारक ने व्यवस्थित, सुरक्षित और दीर्घकालिक आधार प्रदान किया है, तो वह है कांग्रेस और उसके वैचारिक अनुगामियों की मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति। यह कोई भावनात्मक आरोप नहीं, बल्कि स्वतंत्र भारत के राजनीतिक इतिहास से निकला हुआ निष्कर्ष है। कट्टरपंथ न तो आकस्मिक होता है, न ही केवल धर्मग्रंथों की उपज; वह तब संस्थागत रूप लेता है जब राज्य सत्ता उसे छूट देती है और राजनीति उसे संरक्षण प्रदान करती है।
कांग्रेस ने स्वतंत्रता के बाद मुस्लिम समाज को नागरिक के रूप में नहीं, बल्कि स्थायी और भय-आधारित वोटबैंक के रूप में देखा। उसने मुस्लिम समाज को शिक्षा, सामाजिक सुधार और राष्ट्रीय मुख्यधारा से जोड़ने के बजाय एक खतरनाक नैरेटिव गढ़ा— तुम अलग हो, तुम्हारे नियम अलग हैं, और तुम्हारे नाम पर की गई अवैधानिकता भी राजनीतिक सौदेबाज़ी का विषय हो सकती है। यही सोच आगे चलकर कट्टर मानसिकता की उर्वर भूमि बनी।
शाहबानो प्रकरण केवल एक न्यायिक-राजनीतिक टकराव नहीं था; वह उस मानसिकता का सार्वजनिक उद्घाटन था जिसमें संविधान से ऊपर वोटबैंक को रखा गया। सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय को पलटकर कांग्रेस ने यह स्पष्ट कर दिया कि राष्ट्र-निर्माण नहीं, बल्कि मजहबी दबाव के आगे घुटने टेकना उसकी प्राथमिकता है। उस दिन यह तय हो गया था कि तुष्टिकरण अब अपवाद नहीं, बल्कि नीति है।
समाजवादी पार्टी ने इसी मॉडल को और अधिक निर्लज्ज और आक्रामक रूप में अपनाया। उत्तर प्रदेश में कानून-व्यवस्था की कमजोरी कोई प्रशासनिक अक्षमता नहीं थी; वह एक सचेत राजनीतिक रणनीति थी। दंगाइयों पर कार्रवाई से बचना, पुलिस को पंगु बनाना, अपराधी की पहचान उसके मजहब से तय करना—यह सब राज्य के आत्मसमर्पण के उदाहरण थे। यहाँ तुष्टिकरण नीति नहीं, राज्य की विचारधारात्मक हार बन चुका था।
इन दलों ने मुस्लिम समाज को कभी यह नहीं बताया कि कट्टरपंथ उसका सबसे बड़ा शत्रु है। उन्होंने यह स्वीकार करने का साहस नहीं दिखाया कि शिक्षा, सुधार और राष्ट्रवादी चेतना ही उसका वास्तविक भविष्य है। कारण स्पष्ट है— जाग्रत नागरिक वोटबैंक नहीं रहता।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी की दृष्टि यहाँ आरंभ से स्पष्ट रही है। मुसलमान भारत का नागरिक है—पूरे अधिकारों और समान गरिमा के साथ—लेकिन मजहब राष्ट्र से ऊपर नहीं हो सकता। कानून एक होगा, अपराध की कोई धार्मिक पहचान नहीं होगी, और नागरिकता की कसौटी संविधान और राष्ट्र के प्रति निष्ठा होगी।
यही स्पष्टता तथाकथित सेक्युलर और अर्बन-नक्सली जमात को असहज करती है। उनकी राजनीति भ्रम पर आधारित है—डर, अलगाव और निरंतर पीड़ित-बोध के सहारे सत्ता साधने की राजनीति। उन्हें भय है कि यदि मजहबी ध्रुवीकरण समाप्त हुआ, तो उनका वैचारिक अस्तित्व ही समाप्त हो जाएगा।
सबसे बड़ा सत्य यह है कि तुष्टिकरण ने मुस्लिम समाज का सबसे अधिक नुकसान किया है। उसने उसे सुधार से दूर रखा, कट्टर तत्वों के रहमो-करम पर छोड़ा और राष्ट्र के साथ उसके स्वाभाविक संबंध को कमजोर किया। जब समान कानून की बात होती है, यही दल डर फैलाते हैं; जब राष्ट्रवाद की चर्चा होती है, यही लोग फासीवाद का शोर मचाते हैं। क्योंकि उन्हें पता है— तुष्टिकरण समाप्त हुआ तो उनकी राजनीति भी समाप्त हो जाएगी।
यह संघर्ष हिंदू बनाम मुसलमान का नहीं है। यह संघर्ष है—राष्ट्रवादी नागरिकता बनाम मजहबी वोटबैंक का। और इतिहास साक्षी रहेगा कि जहाँ एक ओर भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की वैचारिक स्पष्टता राष्ट्र को जोड़ने का कार्य करेगी, वहीं तुष्टिकरण की राजनीति अपने ही पापों के बोझ तले ढह जाएगी।
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