सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: कृष्ण जन्मभूमि विमर्श (भाग-2)

दस्तावेजी साक्ष्य और पुरातात्विक प्रमाण

मथुरा का इतिहास अत्यंत प्राचीन है। मेगस्थनीज (300 ईसा पूर्व) ने अपने विवरण में 'मेथोरा' (मथुरा का प्राचीन नाम) का उल्लेख किया है। फाह्यान (405 ईस्वी) और ह्वेनसांग (634 ईस्वी) ने मथुरा में भव्य बौद्ध और हिन्दू मंदिरों का विस्तृत वर्णन किया है। विशेष रूप से ह्वेनसांग ने यहाँ बीस बौद्ध विहारों और पाँच हिन्दू देवालयों का उल्लेख किया, जिनमें से कृष्ण जन्मभूमि पर स्थित केशवदेव मंदिर सर्वाधिक प्रतिष्ठित था।

महमूद गजनवी ने 1017-18 में मथुरा पर आक्रमण किया। 

अलबरूनी के अनुसार-

"महमूद ने मथुरा के मंदिर को नष्ट किया जो अद्भुत शिल्प का नमूना था।" 

इब्न असीर ने लिखा कि-

"पाँच सुनहरी मूर्तियाँ, जिनमें से प्रत्येक की आँखें बहुमूल्य रत्नों की थीं," को तोड़ दिया गया और "उस मंदिर को उसकी नींव तक नष्ट कर दिया गया।"

सिकंदर लोदी (1488-1517) के काल में पुनः विध्वंस हुआ। परंतु सर्वाधिक प्रलेखित और निर्णायक विध्वंस औरंगजेब के शासनकाल में हुआ

 'मासिर-ए-आलमगिरी' (औरंगजेब का आधिकारिक इतिहास) में स्पष्ट उल्लेख है: 

"जनवरी 1670 में, अब्दुल नबी खान को मथुरा में केशवराय के मंदिर को ध्वस्त करने का आदेश दिया गया, जो जहांगीर के शासनकाल में बीरसिंह बुंदेला ने 33 लाख रुपये की लागत से बनवाया था।" 

यह वह मंदिर था जो 250 फुट ऊँचा था और उस समय उत्तर भारत का सबसे भव्य मंदिर माना जाता था।

औरंगजेब के फरमान के अनुसार, उस स्थान पर शाही ईदगाह का निर्माण किया गया। 1968 में मथुरा के तत्कालीन कलेक्टर के.के. मुहम्मद (जो बाद में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के क्षेत्रीय निदेशक बने) ने अपने संस्मरणों में लिखा है कि "ईदगाह परिसर में स्पष्ट रूप से मंदिर के अवशेष दिखाई देते हैं, जिनमें कमल और अन्य हिन्दू प्रतीक उकेरे गए हैं।"

1815 में ईस्ट इंडिया कंपनी के सर्वेक्षक फ्रांसिस बुकानन ने लिखा-

"कटरा केशवदेव में एक विशाल चबूतरा है जिस पर एक मस्जिद है, जो निश्चित रूप से एक हिन्दू मंदिर के अवशेषों पर बनी है।"
1883 में एफ.एस. ग्राउज़ ने 'मथुरा: अ डिस्ट्रिक्ट मेमॉयर' में इस तथ्य को पुष्ट किया।

सांख्यिकीय परिप्रेक्ष्य: मध्यकालीन विध्वंस का पैमाना

मंदिर विध्वंस केवल मथुरा तक सीमित नहीं था। विभिन्न ऐतिहासिक स्रोतों के अनुसार, मध्यकालीन आक्रमणों में हजारों मंदिरों का विनाश हुआ। रिचर्ड ईटन (अमेरिकी इतिहासकार) ने अपने शोध "Temple Desecration and Indo-Muslim States" (2000) में 1192 से 1729 के बीच लगभग 80 प्रलेखित बड़े मंदिर विध्वंसों की सूची दी है, हालांकि उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि वास्तविक संख्या इससे कहीं अधिक हो सकती है।

सीताराम गोयल की विवादास्पद लेकिन व्यापक रूप से उद्धृत पुस्तक "Hindu Temples: What Happened to Them" (1990-1991) में 2000 से अधिक स्थलों का उल्लेख है जहाँ मंदिर विध्वंस के साक्ष्य मिलते हैं। यद्यपि इन आँकड़ों पर विवाद है, लेकिन पुरातात्विक और ऐतिहासिक साक्ष्य यह स्थापित करते हैं कि मंदिर विध्वंस एक व्यापक घटना थी।

विशेष रूप से औरंगजेब के शासनकाल (1658-1707) में यह प्रवृत्ति चरम पर पहुँची। उसके फरमानों में काशी विश्वनाथ मंदिर (1669), मथुरा का केशवदेव मंदिर (1670), और अनेक अन्य प्रमुख मंदिरों के विध्वंस का स्पष्ट उल्लेख है।

क्रमशः


टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

संविधान सभा की बहसों में छिपा भारत का असली सपना

संविधान निर्माण की प्रक्रिया, प्रमुख बहसें, और उन विवादों का विश्लेषण जो आज भी प्रासंगिक हैं संविधान सभा की बहसों में छिपा भारत का असली सपना  एक राष्ट्र की नींव 26 जनवरी 1950 को भारत ने अपना संविधान लागू किया। यह केवल एक कानूनी दस्तावेज़ नहीं था, बल्कि एक नवजात राष्ट्र का सामूहिक सपना था। इस संविधान को बनाने में 2 वर्ष, 11 महीने और 18 दिन का समय लगा। संविधान सभा में कुल 165 बैठकें हुईं, जिनमें से 114 दिन केवल संविधान के प्रारूप पर विचार-विमर्श में व्यतीत हुए। यह विश्व के किसी भी लोकतांत्रिक संविधान निर्माण की सबसे लंबी और सबसे गहन बहस थी। संविधान सभा की बहसों में भारत का वास्तविक स्वरूप उभरकर आया। यहाँ केवल कानूनी धाराएँ नहीं लिखी गईं, बल्कि एक बहुलतावादी, धर्मनिरपेक्ष और समतामूलक समाज की कल्पना को मूर्त रूप दिया गया। इन बहसों में जो तर्क-वितर्क हुए, जो असहमतियाँ व्यक्त हुईं, और जो समझौते किए गए, वे आज भी भारतीय लोकतंत्र की समझ के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। संविधान सभा की संरचना: प्रतिनिधित्व का गणित संविधान सभा का गठन कैबिनेट मिशन योजना 1946 के...

UGC विनियम 2026: उच्च शिक्षा में समानता का नया ढांचा (भाग-1)

UGC विनियम 2026 ऐतिहासिक संदर्भ और बदलाव का दौर भारतीय उच्च शिक्षा व्यवस्था में एक नया अध्याय शुरू हो चुका है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा जारी 'उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा देना विनियम, 2026' न केवल एक प्रशासनिक सुधार है, बल्कि यह भारतीय समाज की सबसे गहरी जड़ों में छिपे भेदभाव और असमानता से निपटने का एक महत्वाकांक्षी प्रयास है। यह लेख श्रृंखला इन नए नियमों की गहन पड़ताल करती है - न केवल उनकी संरचना और प्रावधानों की, बल्कि उनके पीछे के सामाजिक-राजनीतिक संदर्भ, संभावित परिणामों और विवादास्पद पहलुओं की भी। 2012 से 2026 तक का सफर: तीन चरणों में बदलाव भारतीय परिसरों में जातिगत और सामाजिक भेदभाव को रोकने के प्रयास कोई नई बात नहीं हैं। 2012 में UGC ने पहली बार 'SC/ST के छात्रों के खिलाफ भेदभाव की रोकथाम के लिए विनियम' जारी किए थे। उस समय का फोकस मुख्य रूप से अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के छात्रों तक सीमित था। 2024 में एक ड्राफ्ट सामने आया जिसमें पहली बार अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) को भी शामिल करने का प्रस्ताव रखा गया। लेकिन उस ड्...

हर शाख पे उल्लू बैठा है —अंजाम-ए-कांग्रेस क्या होगा?

'हर शाख पे उल्लू बैठा है' के परिप्रेक्ष्य में पार्टी के वैचारिक पतन की एक तीखी राष्ट्रवादी पड़ताल। राष्ट्रचिन्तन — अंजाम-ए-कांग्रेस राजनीतिक विश्लेषण · कांग्रेस का पतन · विशेष आलेख · अप्रैल 2026 ▶ अप्रैल 2026 · राष्ट्रीय राजनीति विशेषांक जो दल अपने बयानों से अपने शत्रु को संजीवनी देता रहे "हर शाख पे उल्लू बैठा है, अंजाम-ए-गुलिस्तां क्या होगा" — मिर्ज़ा ग़ालिब उसका भविष्य इतिहास पहले ही लिख चुका है म.च. शास्त्री मनोज चतुर्वेदी शास्त्री Rashtra-Chintan · राष्ट्रचिन्तन · अप्रैल 2026 'हर शाख पे उल्लू बैठा है, अंजामे गुलिस्तां क्या होगा?' मिर्ज़ा ग़ालिब का यह शेर जब लिखा गया था, तब शायद उन्हें यह नहीं पता था कि डेढ़ सौ वर्ष बाद यह भारत की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी पर इतना सटीक बैठेगा। कांग्रेस का गुलिस्तां आज वह है, जहाँ हर शाख पर एक ऐसा नेता विराजमान है जो अपने ही दल की जड़ें काट रहा है — और भाजपा को घर बैठे संजीवनी दे रहा है। हा...