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न खाता न बही, जो मोदी कहे वही सही

भारतीय राजनीति में व्यक्तिवाद का उभरता संकट - भाजपा और RSS में मोदी-केंद्रित राजनीति का प्रतीकात्मक चित्रण
क्या भाजपा और संघ परिवार परिवारवाद से भी घातक व्यक्तिवादी राजनीति की ओर अग्रसर हैं? एक विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण।

भाजपा और संघ में व्यक्तिवाद: परिवारवाद से भी बड़ा खतरा?


कांग्रेस, समाजवादी पार्टी सहित समस्त विपक्षी दलों पर दीर्घकाल से परिवारवादी होने के आरोप भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा प्रक्षेपित किए जाते रहे हैं। यह आरोप इतनी प्रखरता और नियमितता से लगाए गए कि भारतीय लोकतंत्र में "परिवारवाद" शब्द ही एक राजनीतिक अभिशाप बन गया

परंतु आज सर्वाधिक महत्वपूर्ण और विचारणीय प्रश्न यह उभरता है कि क्या भाजपा और संघ परिवार स्वयं "व्यक्तिवादी" राजनीति की अभूतपूर्व नींव प्रस्तरित करते हुए प्रतीत नहीं हो रहे? एक कालखंड था जब देवकीनंदन पांडे द्वारा उद्घोषित किया गया था कि "इंदिरा इज़ इंडिया, इंडिया इज़ इंदिरा"। उस वाक्य को तानाशाही प्रवृत्ति का प्रतीक मानकर दशकों तक भर्त्सना की गई।

किंतु आज का परिदृश्य उससे भी अधिक चिंताजनक है। आज नरेंद्र मोदी ही सर्वस्व हो गए हैं—वही राष्ट्र का पर्याय हैं, वही संविधान के व्याख्याता हैं, वही हिंदुत्व के एकमात्र ब्रांड एंबेसेडर बन चुके हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, जो स्वयं को विश्व का वृहत्तम संगठन घोषित करता है, "मोदी" नामक व्यक्तित्व के समक्ष बौना प्रतीत होता है। संघ की वैचारिकी, उसकी संगठनात्मक सामर्थ्य, उसके आदर्श—सब कुछ एक व्यक्ति की छाया में विलीन होते दिख रहे हैं।

व्यक्तिवाद: संगठन का क्षरण

व्यक्तिवाद की राजनीति किसी भी संगठन के लिए दीर्घकालीन विनाश का कारक सिद्ध होती है। जब संगठन का समस्त ध्यान एक व्यक्ति के गुणगान, उसके चित्र, उसके नाम और उसकी उपलब्धियों के प्रचार में केंद्रित हो जाता है, तो संगठनात्मक लोकतंत्र, सामूहिक निर्णय प्रक्रिया और वैचारिक बहुलता की हत्या हो जाती है।

भाजपा, जो कभी "सामूहिक नेतृत्व" के सिद्धांत पर गर्व करती थी, आज "एक नेता, एक विचार, एक आदेश" के सूत्र पर संचालित होती प्रतीत होती है। चुनावी रणनीति में "मोदी की गारंटी", विज्ञापनों में मोदी का चेहरा, भाषणों में मोदी का उल्लेख, यहाँ तक कि योजनाओं में मोदी का नाम—यह सब भाजपा को एक व्यक्ति-केंद्रित राजनीतिक उद्यम में परिवर्तित कर रहा है।

क्या यह परिवारवाद से भी अधिक घातक नहीं? परिवारवाद में कम से कम कुछ व्यक्तियों का समूह होता है; यहाँ तो समस्त सत्ता, समस्त गौरव, समस्त श्रेय एक ही व्यक्ति में निहित कर दिया गया है।

संघ की चुप्पी: वैचारिक समर्पण या रणनीतिक मौन?

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, जो स्वयं को भारतीय राष्ट्रवाद का सांस्कृतिक संरक्षक मानता है, मोदी के व्यक्तित्व पूजन के समक्ष मौन क्यों है? क्या यह मौन स्वीकृति है, या फिर यह असहायता का प्रतीक है?

संघ ने अपने इतिहास में कभी किसी राजनीतिक नेता को इतनी निरंकुशता नहीं दी। अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी जैसे दिग्गज नेताओं को भी संघ के वैचारिक मार्गदर्शन में रहना पड़ता था। परंतु मोदी के समक्ष संघ न केवल नतमस्तक है, बल्कि अपनी वैचारिक स्वायत्तता का परित्याग करता प्रतीत होता है।

यह परिस्थिति अत्यंत विचित्र है: एक संगठन जो "व्यक्ति पूजा" के विरुद्ध था, आज स्वयं उसी का माध्यम बन गया है।

लोकतंत्र में व्यक्तिवाद का संकट

लोकतंत्र में व्यक्तिवाद का अतिरेक संस्थाओं को कमज़ोर करता है। जब एक व्यक्ति ही निर्णायक, क्रियान्वयक और मूल्यांकनकर्ता बन जाता है, तो संस्थागत जवाबदेही समाप्त हो जाती है। कैबिनेट, संसद, न्यायपालिका, मीडिया—सभी संस्थाएँ एक व्यक्ति की छाया में सिकुड़ने लगती हैं।

भारत ने आपातकाल में व्यक्तिवादी शासन का दंश झेला था। तब इंदिरा गांधी को सर्वशक्तिमान बनाने का प्रयास हुआ था। आज वही खतरा भिन्न वेश में, भिन्न नारों के साथ पुनः उपस्थित हो रहा है।

आत्ममंथन की आवश्यकता

भाजपा और संघ परिवार को गंभीर आत्ममंथन की आवश्यकता है। यदि वे वास्तव में परिवारवाद के विरोधी हैं, तो व्यक्तिवाद के विरोधी भी होने चाहिए। यदि वे संगठनात्मक लोकतंत्र में विश्वास करते हैं, तो एक व्यक्ति के इर्द-गिर्द निर्मित राजनीतिक ढाँचे का विकेंद्रीकरण करना होगा।

"न खाता न बही, जो मोदी कहे वही सही"—यह न केवल लोकतंत्र के लिए, बल्कि भाजपा और संघ की दीर्घकालीन विश्वसनीयता के लिए भी घातक है। व्यक्ति आते-जाते हैं, परंतु संस्थाएँ और विचार शाश्वत होते हैं। यदि यह सत्य विस्मृत हुआ, तो भारतीय राजनीति में एक और अध्याय जुड़ेगा—व्यक्तिवाद के पतन का अध्याय। 

संक्षिप्त विश्लेषण 

भारतीय जनता पार्टी, जो परिवारवाद की आलोचक रही, आज स्वयं व्यक्तिवादी राजनीति का प्रतिनिधित्व कर रही है। "मोदी की गारंटी", चुनावी विज्ञापनों में केवल मोदी का चेहरा, और समस्त योजनाओं में उनके नाम का समावेश स्पष्टतः व्यक्ति-केंद्रित रणनीति को दर्शाता है। सामूहिक नेतृत्व का सिद्धांत विलुप्त हो चुका है।

मोदी के व्यक्तित्व पूजन ने संस्थागत जवाबदेही को कमजोर किया है। कैबिनेट, संसद और पार्टी संगठन की स्वायत्तता क्षीण हुई है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, जो परंपरागत रूप से वैचारिक मार्गदर्शक रहा, मोदी के समक्ष मौन प्रतीत होता है।

परिवारवाद में कम से कम कुछ व्यक्तियों का समूह होता है, परंतु व्यक्तिवाद समस्त सत्ता को एक व्यक्ति में केंद्रित कर देता है। यह लोकतंत्र के लिए अधिक घातक है। संगठनात्मक लोकतंत्र का यह ह्रास भारतीय राजनीति के लिए गंभीर चुनौती है।

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