अध्याय–2
(शुद्ध शास्त्रीय, संस्कृत-उद्धरणों सहित ग्रन्थीय विवेचन)
सनातन परंपरा में अंकुश किसी हिंसक उपकरण का द्योतक नहीं, बल्कि अधिशासन (Governance) का प्रतीक है. श्रीगणेश के हस्त में अंकुश का तात्पर्य है—बल का नहीं, बुद्धि का राज्य। यह राज्य बाह्य नहीं, आन्तरिक है; शत्रु बाहर नहीं, मन के भीतर है।
गणेश-ध्यान परंपरा में अंकुश का उल्लेख अनिवार्यतः आता है—
पाशाङ्कुशधरं देवं गजवक्त्रं चतुर्भुजम् (गणेश ध्यान)
यहाँ अंकुश पाश के साथ संयुक्त है—जिससे स्पष्ट है कि बंधन का नियमन ही अंकुश का प्रयोजन है।
शास्त्रों में निग्रह और दमन का स्पष्ट भेद है।
दमन = हिंसक दबाव, कुंठा का जन्म
निग्रह = विवेकपूर्ण नियंत्रण, उन्नति का कारण
महाभारत का कथन है—निग्रहः श्रेयसः पन्था निग्रहादेव सिद्धयः(शान्ति पर्व) अर्थात् कल्याण का मार्ग निग्रह है; सिद्धि दमन से नहीं, संयम से आती है। अंकुश इसी निग्रह-तत्त्व का मूर्त रूप है।
निग्रह = विवेकपूर्ण नियंत्रण, उन्नति का कारण
महाभारत का कथन है—निग्रहः श्रेयसः पन्था निग्रहादेव सिद्धयः(शान्ति पर्व) अर्थात् कल्याण का मार्ग निग्रह है; सिद्धि दमन से नहीं, संयम से आती है। अंकुश इसी निग्रह-तत्त्व का मूर्त रूप है।
कठोपनिषद् का रथ-रूपक अंकुश-तत्त्व की आधारशिला है—
आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव तु । बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च (कठोपनिषद् 1.3.3)
यहाँ—बुद्धि = सारथी, मन = प्रग्रह (लगाम) परंतु सारथी अंकुश के बिना रथ नहीं चला सकता। अतः अंकुश = बुद्धि का अधिकार-चिन्ह। जिस जीवन में बुद्धि निष्क्रिय है, वहाँ इन्द्रियाँ स्वच्छन्द होकर विनाश करती हैं।
भगवद्गीता अनुशासन को स्वतंत्रता का शत्रु नहीं, आधार मानती है—
युक्तः कर्मफलं त्यक्त्वा शान्तिमाप्नोति नैष्ठिकीम् (गीता 5.12)
यह युक्त अवस्था ही अंकुश का फल है—जहाँ कर्म होता है, पर कर्तापन का उन्माद नहीं।
गीता आगे कहती है—
उद्धरेदात्मनाऽत्मानं नात्मानमवसादयेत् (गीता 6.5)
यह उद्धार बाह्य नहीं, आन्तरिक नियंत्रण द्वारा होता है—अर्थात् अंकुश से।
वेदों का केंद्रीय सिद्धांत है—ऋत (Cosmic Order)।
ऋग्वेद में कहा गया—
ऋतस्य पन्थामन्वेति साधुः (ऋग्वेद 10.87.1)
ऋत का अर्थ है—नियमित स्वतंत्रता, मर्यादित प्रवाह. अंकुश इसी ऋत का व्यक्तिगत अनुप्रयोग है। जहाँ ऋत नहीं, वहाँ अराजकता है; जहाँ अंकुश नहीं, वहाँ जीवन-विघ्न है।
शास्त्रीय भाषा में जिसे निग्रह कहा गया, आधुनिक मनोविज्ञान उसे Impulse Control कहता है। पर सनातन दर्शन इससे आगे जाता है. वह कहता है कि—आवेग शत्रु नहीं, कच्ची ऊर्जा है। अंकुश उसे दिशा देता है। यही कारण है कि गणेश इच्छा विनाशक नहीं, इच्छा-शासक हैं।
अतः अंकुश का तत्त्व यह घोषित करता है—शक्ति का निषेध नहीं, शासन आवश्यक है, इच्छा का उच्छेद नहीं, नियमन अनिवार्य है, स्वतंत्रता का विरोध नहीं, मर्यादा उसका आधार है.
श्रीगणेश का अंकुश कहता है—
जिसने अपने मन को शासित कर लिया, उसने बाह्य संसार को जीत लिया।
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