1. ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य : साझी विरासत और विभाजन की छाया
स्वतंत्रता आंदोलन के समय कांग्रेस वह मंच थी जहाँ हिंदू-मुस्लिम एकता की बात होती थी। मौलाना आज़ाद, मोहम्मद अली और शौकत अली जैसे नेता कांग्रेस के भीतर रहकर राष्ट्रीय संघर्ष के प्रतीक बने। लेकिन 1940 के दशक में मुस्लिम लीग के उदय और ‘दो राष्ट्र सिद्धांत’ के प्रसार ने इस एकता की नींव हिला दी। विभाजन के बाद कांग्रेस ने भारतीय मुसलमानों के लिए सुरक्षा-राजनीति का मार्ग अपनाया, जो धीरे-धीरे वोटबैंक की रणनीति में बदल गया।
2. वोटबैंक की राजनीति : संरक्षण बनाम सशक्तिकरण
आज़ादी के बाद कांग्रेस ने मुसलमानों को संरक्षण का आश्वासन तो दिया, पर वास्तविक सशक्तिकरण से दूर रखा।
1950-1980: मुस्लिम नेतृत्व को स्थान नहीं दिया गया।
1986 शाहबानो प्रकरण: न्यायालय के निर्णय को पलटकर कांग्रेस ने तुष्टिकरण का प्रतीक बना दिया।
इससे हिंदू समाज में असंतोष और मुसलमानों में निर्भरता दोनों बढ़े।
3. 21वीं सदी का परिदृश्य : कांग्रेस का सिकुड़ता जनाधार
2014 के बाद मुसलमानों ने भी कांग्रेस को “कमज़ोर विकल्प” मानना शुरू किया। आज मुस्लिम मतदाता क्षेत्रीय दलों — SP, RJD, TMC, AIMIM — में बंट चुका है।
कांग्रेस का वह वादा कि “हम मुसलमानों के साथ हैं”, अब जमीनी हकीकत नहीं बल्कि अतीत की गूंज है।
4. मुस्लिम समाज की नई दिशा
भारत का मुस्लिम समाज अब दो हिस्सों में बँट चुका है—
1. सेक्युलर राजनीति-आश्रित वर्ग, जो सुरक्षा चाहता है।
2. स्वतंत्र मुस्लिम नेतृत्व-केंद्रित वर्ग, जो AIMIM या अन्य विकल्पों को देख रहा है।
कांग्रेस इनमें से किसी को भी स्पष्ट नेतृत्व नहीं दे पा रही।
5. राष्ट्र-राजनीतिक निष्कर्ष
कांग्रेस की पुरानी नीति “बांटो और राज करो” अब अप्रासंगिक है।
विकास, शिक्षा और प्रतिनिधित्व के सवाल पर न तो मुसलमान संतुष्ट हैं, न हिंदू भरोसा करते हैं।
भारत का नया मतदाता धार्मिक पहचान से अधिक राष्ट्रीय नीति और प्रदर्शन को महत्व देता है।
6. अतीत का नारा, वर्तमान का भ्रम
“कांग्रेस ने मुसलमानों को सुरक्षा दी, पर स्वाभिमान नहीं।”
“मुसलमानों ने कांग्रेस को वोट दिया, पर नेतृत्व नहीं।”
यही वह राजनीतिक असंतुलन है, जिसने कांग्रेस को न तो मुसलमानों का नेता रहने दिया, न हिंदुओं का प्रतिनिधि।
हमारा मत
आज “कांग्रेस है तो मुसलमान हैं” केवल एक नारा है —इतिहास की याद के रूप में सच, पर राजनीति के वर्तमान में झूठ।

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