भारत के राजनीतिक इतिहास में "समाजवाद" शब्द जितना बार बोल गया, वह उतनी ही बार विकृत होता गया. समाजवाद जो कभी समानता, नैतिकता और न्याय का प्रतीक था. आज वोटबैंक, परिवारवाद और अवसरवाद की संज्ञा बन चुका है. इस विकृति का सबसे बड़ा उदहारण है - समाजवादी पार्टी. जिसने लोकनायक जयप्रकाश नारायण के सपनों के समाजवाद को केवल नारे और जातीय समीकरण तक सीमित कर दिया. जयप्रकाश नारायण का समाजवाद किसी राजनीतिक सत्ता का हथियार नहीं था बल्कि वह एक नैतिक आन्दोलन था.
उनका सम्पूर्ण क्रांति का आह्वान केवल इंदिरा गाँधी की तानाशाही के ख़िलाफ़ नहीं था, बल्कि उस राजनीतिक संस्कृति के ख़िलाफ़ था जिसमें झूठ, भ्रष्टाचार और स्वार्थ सामान्य बन चुके थे.
आज की समाजवादी पार्टी, विशेषकर अखिलेश यादव के नेतृत्व में,जेपी के समाजवाद से कोसों दूर है. जहाँ जयप्रकाश नारायण ने सत्ता से दूरी बनाकर समाज को दिशा दी, वहीँ अखिलेश यादव के नेतृत्व वाली समाजवादी पार्टी ने सत्ता को ही समाजवाद का अंतिम लक्ष्य बना लिया.
अखिलेश का समाजवाद दरअसल "जातीय और साम्प्रदायिक गठजोड़" की राजनीति में सिमट गया है.
यादव-मुस्लिम समीकरण इसकी रीढ़ है. जबकि दलित, ब्राह्मण और अन्य पिछड़ा वर्ग अखिलेश के चुनावी गणित का हिस्सा हैं, वैचारिक प्रतिबद्धता का नहीं. अखिलेश यादव की राजनीति ने समाजवाद को नैतिक दर्शन से हटाकर वंशवादी परम्परा में बदल दिया है. आज समाजवादी पार्टी एक व्यक्ति, एक परिवार और एक जातीय ब्लॉक की पार्टी बनकर रह गई है.
जयप्रकाश नारायण ने कभी सत्ता की मांग नहीं की. 1977 में जनता पार्टी की जीत के बाद उन्हें प्रधानमंत्री बनने का अवसर मिला, पर उन्होंने साफ़ कहा -
"मैं सत्ता नहीं, परिवर्तन चाहता हूँ".
जबकि इसके ठीक विपरीत, अखिलेश यादव समाजवाद को सत्ता के वैचारिक जामा के रूप में पहनते हैं. उनकी राजनीती में विचार गौण और समीकरण प्रधान हैं.
जय प्रकाश नारायण के समाजवाद का केंद्र "आदर्श मनुष्य" था. उनका मानना था कि जब तक व्यक्ति अपने भीतर के लालच, झूठ और हिंसा से मुक्त नहीं होगा, तब तक कोई वयवस्था न्यायपूर्ण नहीं बन सकती. उन्होंने समाजवाद को "नैतिक आत्मसयंम" और सामाजिक सेवा का माध्यम माना.
जबकि इसके ठीक उलट, समाजवादी पार्टी का समाजवाद "व्यवहारिक मजबूरी" बन गया. आज समाजवादी पार्टी का हर कदम उसी "राजनीतिक व्यापार" की तरह है जिसके विरुद्ध जयप्रकाश नारायण ने सम्पूर्ण क्रांति चलाई थी.
जयप्रकाश नारायण ने कहा था -
"यदि समाजवाद को बचाना है, तो पहले समाज को सत्य बोलने की हिम्मत देनी होगी."
पर आज समाजवादी पार्टी सत्य नहीं बोलती, कथित "धर्म निरपेक्षता" की आड़ में मुस्लिम तुष्टिकरण करती है.
जयप्रकाश नारायण "लोकनायक" थे क्योंकि उन्होंने जनता को जागरूक किया. जबकि मुलायम पुत्र अखिलेश यादव "नेता पुत्र" हैं. जयप्रकाश नारायण "धरातल के नेता थे". जबकि अखिलेश यादव "एयरकंडीशन कार्यालयों" बाहर नहीं निकले.
आज अगर जयप्रकाश नारायण जीवित होते, तो वे समाजवादी पार्टी के पोस्टरों पर अपना नाम देखकर दुखी होते. क्योंकि उन्होंने जिस समाजवाद की परिकल्पना की थी, उसमें न जाति थी, न तुष्टिकरण और न ही परिवारवाद.
जयप्रकाश नारायण ने कहा था-
"सत्ता की लोलुपता से बड़ी कोई दासता नहीं होती".
आज अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी उसी सत्ता की दासता में डूबी हुई है. विचार नहीं वोटों की गुलाम.

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