सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

कम से कम अबु आसिम काज़मी से इतना तो सीख लीजिए

मीडिया सूत्रों के हवाले से मिली जानकारी के अनुसार समाजवादी पार्टी की महाराष्ट्र इकाई के अध्यक्ष अबु आसिम आज़मी ने मुस्लिम धर्मगुरुओं एवं नेताओं संग की गई एक बैठक में मुस्लिम धर्मगुरुओं से अपील की कि संविधान को बचाने के लिए अपना भाई भी विरोधियों के साथ खड़ा हो तो उसे भी भगा दें। यहां उनका ईशारा असदुद्दीन ओवैसी से रहा होगा, ऐसा अनुमान लगाया जा रहा है। 

हमारे लिए यह जानना महत्वपूर्ण नहीं है कि आजमी किस पर निशाना साध रहे थे लेकिन उनका यह स्टेटमेंट कि "अपना भाई भी विरोधियों के साथ खड़ा हो तो उसे भी भगा दें।" वास्तव में समस्त हिन्दू समाज के लिए एक बहुत बड़ी सीख है। हम हिन्दू एक अरसे से उन तमाम "कथित सेक्युलर बुद्धिजीवी" हिंदूओं को ढो रहे हैं जो लगातार राष्ट्र विरोधी ताकतों के साथ न केवल कंधे से कंधा मिलाकर खड़े हुए हैं बल्कि हिन्दू सनातन संस्कृति, संस्कार, सभ्यता और परम्पराओं सहित पवित्र हिन्दू धर्मग्रंथों, ऋषि-मुनियों और देवी-देवताओं का मखौल उड़ाने से भी बाज नहीं आते हैं। तथाकथित सेक्युलरिज्म की आड़ में राष्ट्रविरोधी गतिविधियों को बढ़ावा देने वालों को हमारे इन्हीं "सेक्युलर हिन्दू भाइयों" द्वारा परोक्ष-अपरोक्ष रूप से संरक्षण दिया जाता है। 

इस देश में अभिनेता- अभिनेत्रियां, साहित्यकार, शायर-कवि, खिलाड़ी, राजनीतिज्ञ, सोशल एक्टिविस्ट सहित न जाने कितने "कथित बुद्धिजीवी" हैं जिन्होंने मन, कर्म और वचनों से कहीं न कहीं, कभी न कभी भारतीय संस्कृति, सभ्यता और परम्पराओं सहित हिन्दू आस्थाओं और हिंदुत्व पर गहरी चोट की है। 

हिन्दू हितों पर यदा-कदा कुठाराघात करने वाले ऐसे तमाम लोग हैं जो अपने आपको "हिन्दू" कहते हैं, परन्तु उन्होंने शायद ही कभी हिन्दू समाज और वैदिक धर्म के उत्थान के लिये कोई सार्थक और सकारात्मक प्रयास किया हो। हिंदुओं को जातिवाद का दंश देने वाले, उसे आरक्षण की अग्नि में जलाने वाले ऐसे कई महानुभाव इस देश में हैं। और तो और, कई  धर्माचार्य जिन्हें "इस्लामचार्य" भी कहा जा सकता है, इसी हिन्दू समाज की देन हैं, जिन्होंने अपने क्षुद्र राजनीतिक स्वार्थों की पूर्ति के लिए "संत-महात्मा और कथावाचक" जैसे पावन और पवित्र शब्दों का भी घोर अपमान किया है और कर रहे हैं।

लेकिन हम इन सबको लगातार क्यों ढो रहे हैं, यह शायद हम भी नहीं जानते। हम गांधीवाद की कायरतापूर्ण अहिंसात्मक नीतियों को छोड़कर शठे शठयम समाचरेत का सिद्धान्त कब अपनाएंगे।

हमें अबु कासिम काजमी से यह सीख लेनी ही चाहिए कि यदि आपका अपना भाई भी विरोधियों के साथ खड़ा हो तो उसे भी छोड़ देना चाहिए। 
आखिर हम कब समझेंगे कि सांप को दूध पिलाने पर भी वह अंततः ज़हर ही उगलता है। हमें उन तमाम विषधरों का मोह छोड़ना ही होगा जो हमारी ही थाली में खाते हैं और हम पर ही गुर्राते हैं।

नीति शास्त्र भी कहता है कि यदि शरीर के किसी अंग में ज़हर फैलने लगे तो तुरन्त उस अंग को काटकर शरीर से अलग कर देना चाहिए, अन्यथा पूरे शरीर में ज़हर फैलने का भय रहता है।

🖋️ *मनोज चतुर्वेदी "शास्त्री"*
समाचार सम्पादक- उगता भारत हिंदी समाचार-
(नोएडा से प्रकाशित एक राष्ट्रवादी समाचार-पत्र)

व्हाट्सऐप-

 9058118317

ईमेल-
 manojchaturvedi1972@gmail.com

ब्लॉगर-

https://www.shastrisandesh.co.in/

फेसबुक-

https://www.facebook.com/shastrisandesh

ट्विटर-

https://www.twitter.com/shastriji1972

*विशेष नोट- उपरोक्त विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं। उगता भारत समाचार पत्र के सम्पादक मंडल का उनसे सहमत होना न होना आवश्यक नहीं है। हमारा उद्देश्य जानबूझकर किसी की धार्मिक-जातिगत अथवा व्यक्तिगत आस्था एवं विश्वास को ठेस पहुंचाने नहीं है। यदि जाने-अनजाने ऐसा होता है तो उसके लिए हम करबद्ध होकर क्षमा प्रार्थी हैं।

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

संविधान सभा की बहसों में छिपा भारत का असली सपना

संविधान निर्माण की प्रक्रिया, प्रमुख बहसें, और उन विवादों का विश्लेषण जो आज भी प्रासंगिक हैं संविधान सभा की बहसों में छिपा भारत का असली सपना  एक राष्ट्र की नींव 26 जनवरी 1950 को भारत ने अपना संविधान लागू किया। यह केवल एक कानूनी दस्तावेज़ नहीं था, बल्कि एक नवजात राष्ट्र का सामूहिक सपना था। इस संविधान को बनाने में 2 वर्ष, 11 महीने और 18 दिन का समय लगा। संविधान सभा में कुल 165 बैठकें हुईं, जिनमें से 114 दिन केवल संविधान के प्रारूप पर विचार-विमर्श में व्यतीत हुए। यह विश्व के किसी भी लोकतांत्रिक संविधान निर्माण की सबसे लंबी और सबसे गहन बहस थी। संविधान सभा की बहसों में भारत का वास्तविक स्वरूप उभरकर आया। यहाँ केवल कानूनी धाराएँ नहीं लिखी गईं, बल्कि एक बहुलतावादी, धर्मनिरपेक्ष और समतामूलक समाज की कल्पना को मूर्त रूप दिया गया। इन बहसों में जो तर्क-वितर्क हुए, जो असहमतियाँ व्यक्त हुईं, और जो समझौते किए गए, वे आज भी भारतीय लोकतंत्र की समझ के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। संविधान सभा की संरचना: प्रतिनिधित्व का गणित संविधान सभा का गठन कैबिनेट मिशन योजना 1946 के...

UGC विनियम 2026: उच्च शिक्षा में समानता का नया ढांचा (भाग-1)

UGC विनियम 2026 ऐतिहासिक संदर्भ और बदलाव का दौर भारतीय उच्च शिक्षा व्यवस्था में एक नया अध्याय शुरू हो चुका है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा जारी 'उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा देना विनियम, 2026' न केवल एक प्रशासनिक सुधार है, बल्कि यह भारतीय समाज की सबसे गहरी जड़ों में छिपे भेदभाव और असमानता से निपटने का एक महत्वाकांक्षी प्रयास है। यह लेख श्रृंखला इन नए नियमों की गहन पड़ताल करती है - न केवल उनकी संरचना और प्रावधानों की, बल्कि उनके पीछे के सामाजिक-राजनीतिक संदर्भ, संभावित परिणामों और विवादास्पद पहलुओं की भी। 2012 से 2026 तक का सफर: तीन चरणों में बदलाव भारतीय परिसरों में जातिगत और सामाजिक भेदभाव को रोकने के प्रयास कोई नई बात नहीं हैं। 2012 में UGC ने पहली बार 'SC/ST के छात्रों के खिलाफ भेदभाव की रोकथाम के लिए विनियम' जारी किए थे। उस समय का फोकस मुख्य रूप से अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के छात्रों तक सीमित था। 2024 में एक ड्राफ्ट सामने आया जिसमें पहली बार अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) को भी शामिल करने का प्रस्ताव रखा गया। लेकिन उस ड्...

गंगा स्नान का वैज्ञानिक महत्व : एक प्रमाणिक और गहन विश्लेषण

  गंगा स्नान को धार्मिक आस्था का विषय माना जाता है — लेकिन इसका एक ठोस वैज्ञानिक आधार भी है, जिसे आधुनिक शोधों ने प्रमाणित किया है। 1. प्राकृतिक एंटीबायोटिक जल गंगाजल में Bacteriophage नामक वायरस पाए जाते हैं, जो हानिकारक बैक्टीरिया को नष्ट कर देते हैं। इसलिए यह पानी सड़ता नहीं, बल्कि शुद्ध बना रहता है — यह आधुनिक माइक्रोबियल साइंस द्वारा प्रमाणित किया जा चुका है।  इसे भी पढ़ें : कार्तिक पूर्णिमा पर स्नान का वैज्ञानिक और आध्यात्मिक महत्व  2. स्किन एवं इम्यून सिस्टम के लिए लाभकारी गंगाजल में विद्यमान खास खनिज (Mineral Salts) व प्राकृतिक माइक्रोब्स त्वचा की मृत कोशिकाओं को हटाते हैं और त्वचा रोगों में उपचारकारी पाए गए हैं। इससे शरीर की immune response क्षमता बढ़ती है — विशेषकर जल-ज्वर, फंगल और फोड़े-फुंसियों जैसे संक्रमणों से लड़ने में। 3. नेगेटिव आयन एनर्जी थैरेपी (Negative Ion Therapy) जब व्यक्ति सूर्योदय या प्रातःकालीन मौसम में गंगा में स्नान करता है, तब उसे नेगेटिव आयन (−IONs) प्राप्त होते हैं — यह वही आयन हैं जो हिमालय, झरनों और बारिश के बाद की हवा में होते हैं। विज्ञान...