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क्या भारत का संविधान मूर्तिपूजा को अनुचित मानता है?

आजकल मूर्तिपूजा को लेकर कई आपत्तिजनक बयान आ रहे हैं, जिसे देखो मुहं उठाकर मूर्तिपूजा और मूर्तिपूजकों के ख़िलाफ़ बोलना शुरू कर देता है और पुलिस-प्रशासन के साथ-साथ हमारी सरकारें भी उसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का नाम देकर पल्ला झाड़ देते हैं। क्या यह सनातन धर्म और मूर्तिपूजकों की आस्था और उनकी श्रद्धा का खुला अपमान नहीं है? 

अभी हाल ही में एक राष्ट्रीय चैनल के एक पत्रकार ने ख़्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती को लेकर कोई टिपण्णी कर दी थी जिसे लेकर उनके मानने वालों में खूब रोष देखने को मिला था और उन पत्रकार महोदय की गिरफ्तारी की मांग भी उठी थी। इससे पहले भी कई बार इस प्रकार की घटनाएं हो चुकी हैं, जिनमें एक-दो लोगों को धार्मिक आस्था को चोट पहुंचाने के नाम पर कत्ल भी कर दिया गया। जिसमें एक प्रमुख नाम हुतात्मा कमलेश तिवारी का  भी है।
*प्रश्न यह नहीं कि मूर्ति पूजा का विरोध कौन कर रहा है, बल्कि प्रश्न यह है कि उन्हें विरोध करने की खुली छूट कौन और क्यों दे रहा है? प्रश्न यह भी है कि श्रीराम मंदिर को मुद्दा बनाकर दो बार पूर्ण बहुमत से सत्ता प्राप्त कर चुकी भाजपा भी मूर्तिपूजा के विरोधियों की नाक में नकेल क्यों नहीं डाल पा रही है।* क्या संविधान इस बात की छूट देता है? एक तरफ आप कहते हैं कि हमारा देश सेक्युलरवादी है, और उसमें रहने वाले प्रत्येक नागरिक को धार्मिक स्वतंत्रता प्रदान की गई है, वह अपनी आस्था और श्रद्धानुसार अपनी संस्कृति, सभ्यता, संस्कारों, परम्पराओं और तीज-त्यौहारों का भलीभांति निर्वहन कर सकता है, तब क्या कारण है कि कोई प्रशांत कनौजिया, रमाकांत यादव या फिर कोई तथाकथित बुद्धिजीवी मूर्तिपूजा और मूर्तिपूजकों का सार्वजनिक रूप से मखौल उड़ा देता है।

यहां गौरतलब है कि मूर्तिपूजा का विरोध करने वाले अधिकांशतः लोग वही हैं जो बात-बात पर संविधान की दुहाई देते हैं, जिन्होंने हर चौराहों पर किसी न किसी की मूर्तियां लगवा रखी हैं, संविधान निर्माता, बापू, आयरन लेडी सहित कई नेताओं की मूर्तियां चौराहों पर लगवाने वाले जब मूर्तिपूजकों का अपमान करते हैं तो गुस्सा नहीं बल्कि हंसी आती है।
मूर्तियां और मंदिर तो महृषि वाल्मीकि, सन्त रविदास, बाबा भीमराव आंबेडकर के भी बनाये जाते हैं और बनाये जा रहे हैं। तब उनपर रोक क्यों नहीं लगवाई जा रही है?

दूसरे हैं आर्यसमाजी, जो खुलेआम मूर्तिपूजा का विरोध करते हैं और हिंदू धर्म की दुहाई देते हैं, क्यों? आप अपने को श्रेष्ठ कैसे कह सकते हैं जबकि आप स्वयं सनातन धर्म की मान्यताओं और मूर्तिपूजा अर्थात सगुण उपासना का घोर विरोध करते हैं। आप कैसे हिंदुओं और हिन्दू धर्म की ठेकेदारी ले सकते हैं, आर्यसमाज क्यों नहीं अपने दूसरे भाइयों का सम्मान नहीं करता? बौद्ध, जैन, सिख, आर्यसमाज और तमाम अन्य मत आखिर निकले तो सनातन धर्म से ही हैं, सनातन इन सभी मतों और सम्प्रदायों का मूल है। 
पीर-फकीरों की मजारों पर मत्था टेकने वाले भी मूर्तिपूजा का विरोध करते हैं, क्यों? 

यह हमारी आस्था और हमारे विश्वास का प्रश्न नहीं अपितु समस्त सनातन समाज और उसकी परम्पराओं, मर्यादा और संस्कृति का प्रश्न है।

समस्त सनातनियों और हिंदुओं को एकजुट होकर सरकार से ऐसे तमाम लोगों के विरुद्ध कड़ी से कड़ी कार्यवाही की मांग रखनी चाहिए जो सार्वजनिक रूप से मूर्तिपूजा और मूर्तिपूजकों पर आपत्तिजनक टिप्पणियां करते हैं। 

*-मनोज चतुर्वेदी "शास्त्री"*
राष्ट्रीय प्रवक्ता
भारतीय केसरिया वाहिनी
लखनऊ 

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