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भारतीय नागरिकता कानून : क्या भारत इजरायल के नक्शे कदम पर चल रहा है ?

नए नागरिकता संशोधन कानून (CAA),२०१९ में ये प्रावधान है कि पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान में धार्मिक उत्पीड़न की वजह से शरणार्थी बने गैर-मुस्लिम (हिन्दू, सिख, बौद्ध, जैन, ईसाई, पारसी) भारतीय नागरिकता पाने के लिए आवेदन कर पाएंगे, अर्थात नागरिकता संशोधन विधेयक के आधार पर पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से धार्मिक उत्पीड़न के कारण वहां से भागकर आए हिंदू, सिख, ईसाई, पारसी, जैन और बौद्ध धर्म मानने वाले भारतीय नागरिकता पा सकते हैं.  अभी तक के कानून के अनुसार किसी भी व्यक्ति को भारतीय नागरिकता लेने के लिए कम से कम 11 साल भारत में रहना पड़ता था. नए कानून के अनुसार पड़ोसी देशों के अल्पसंख्यकों के लिए यह समयावधि 11 से घटाकर 6 साल कर दी गई है.


क्यों हो रहा है नागरिकता संशोधन कानून का विरोध?

इस कानून का इसलिए विरोध हो रहा है क्योंकि इसमें पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश के मुसलमानों को शामिल नहीं किया गया है. विपक्ष इसे धर्म के आधार पर भेदभाव का मामला बता रहा है.
नागरिकता संशोधन कानून को विपक्षी पार्टियां संविधान (Constitution) का उल्लंघन बता रही हैं. वो इसे धर्म के आधार पर भेदभाव का मामला मान रही हैं. जबकि सरकार का कहना है कि इस विधेयक से संविधान का किसी भी तरह से उल्लंघन नहीं होता है.
नागरिकता संशोधन कानून के बाद पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान के गैर-मुस्लिम शरणार्थियों को भारतीय नागरिकता दी जा सकेगी. यही बड़ा सवाल है कि जब पाकिस्तान और बांग्लादेश जैसे मुस्लिम राष्ट्र मुस्लिम शरणार्थियों को अपने यहां की नागरिकता नहीं दे रहे हैं तो फिर भारत में ऐसा कानून क्यों लागू किया जा रहा है?
विपक्षी पार्टियों का कहना है कि इस विधेयक से संविधान के अनुच्छेद 5, 10, 14 और 15 का उल्लंघन होता है.

सवाल है कि आखिर इन अनुच्छेदों में ऐसा क्या है?

संविधान का अनुच्छेद
5 भारतीय नागरिक की पहचान करता है. अनुच्छेद 5 के मुताबिक संविधान लागू होते वक्त उसे ही भारतीय नागरिक माना गया- जिसका जन्म भारत में हुआ हो या जिसके माता-पिता में से कोई एक भारत में जन्मा हो या फिर अगर कोई व्यक्ति भारतीय संविधान लागू होने से कम से कम 5 साल पहले से भारत में रह रहा हो. संविधान लागू होते वक्त इसी आधार पर भारतीय नागरिक की पहचान की गई.
संविधान के अनुच्छेद 10 में नागरिकता के अधिकार के बने रहने का प्रावधान है. इसके मुताबिक अगर कोई व्यक्ति एक बार भारतीय नागरिक बन जाता है तो फिर उसकी नागरिकता बनी रहती है. नए नागरिकता कानून में भी ऐसा कोई प्रावधान नहीं है, जिसमें नागरिकता खत्म करने की बात की गई हो. जो भारतीय नागरिक हैं उनकी नागरिकता बहाल रहेगी.
संविधान का अनुच्छेद 14 बताता है कि कानून के सामने सब बराबर हैं. अनुच्छेद 14 कहता है कि राज्य के कानून के सामने सभी नागरिक बराबर होंगे. धर्म, नस्ल, जाति, लिंग या जन्म के स्थान के आधार पर किसी के साथ भेदभाव नहीं किया जा सकता. राज्य, कानून के सामने सभी नागरिकों को बराबर मानने को बाध्य होगा. राज्य कानून के संरक्षण से किसी नागरिक को बाहर नहीं कर सकता.
इसी अनुच्छेद का हवाला देकर सबसे ज्यादा विरोध हो रहा है. हालांकि लोकसभा को संबोधित करते हुए गृहमंत्री अमित शाह ने कहा था कि, “मैं सदन के माध्यम से पूरे देश को आश्वस्त करना चाहता हूं कि यह विधेयक कहीं से भी असंवैधानिक नहीं है. विधेयक संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन नहीं करता है. अगर इस देश का विभाजन धर्म के आधार पर नहीं होता तो मुझे विधेयक लाने की जरूरत ही नहीं पड़ती.”
संविधान का अनुच्छेद 15 भी राज्य को अपने नागरिकों के साथ भेदभाव करने से रोकता है. अनुच्छेद 15 के मुताबिक राज्य किसी नागरिक को धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर भेदभाव नहीं करेगा. संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 का हवाला देकर नए नागरिकता कानून का ज्यादा विरोध हो रहा है.
संविधान के अनुच्छेद 13 में नागरिकों के मौलिक अधिकारों का जिक्र है. संविधान का अनुच्छेद 13 कहता है कि ऐसा कोई भी कानून नहीं बनाया जा सकता जो नागरिकों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता हो. 
दुनियाभर के बाकी देश किस आधार पर नागरिकता प्रदान करते हैं?

दुनियाभर में नागरिकता प्रदान करने के दो सिद्धांत हैं- पहला ज्यूस सैंग्यूनिस और दूसरा ज्यूस सोलि. ज्यूस सैंग्यूनिस में नस्ल या रक्त संबंध के आधार पर नागरिकता प्रदान की जाती है. इस कॉन्सेप्ट के हिसाब से माता-पिता की नागरिकता के आधार पर बच्चे को नागरिकता मिलती है. ज्यूस सोलि में जमीन के आधार पर नागरिकता मिलती है. बच्चा जहां की धरती पर पैदा होगा
, उसे वहां की नागरिकता हासिल होगी.
इसके अलावा एक देश का नागरिक किसी दूसरे देश में जाकर वहां की नागरिकता ले सकता है लेकिन उसे नेचुरलाइजेशन की अवधि पूरी करनी होगी. ये अलग-अलग देशों में अलग-अलग है. मसलन इजरायल जैसे देश में ये कानून है कि वहां की नागरिकता को हासिल करने के लिए किसी भी व्यक्ति को नागरिकता के आवेदन से पहले कम से कम
5 साल तक स्थायी निवासी के तौर पर देश में रहा हो. इसमें वो 3 साल की अवधि तक देश में लगातार रहा हो.

कई इस्लामिक देशों में भी मुसलमानों को नहीं मिलती नागरिकता
?

मुसलमानों के लिए नागरिकता को लेकर कई और देशों के कानून भी विवादास्पद और कड़े रहे हैं. जापान यूं तो सभी लोगों के लिए अपने दरवाजे खोलकर रखता है. वहां बाहरी देशों से अलग-अलग धर्मों के लोगों को तय समय और औपचारिकताएं पूरी करने के बाद नागरिकता हासिल हो जाती हैं लेकिन अप्रत्यक्ष तौर पर मुस्लिमों के लिए उसके दरवाजे बंद रहते हैं. वहां मुस्लिमों की आबादी
9,000 से 10,000 है, ये वो मुस्लिम हैं जो इंडोनेशिया से बहुत समय पहले जापान आ गए थे.
चीन भी उईगर मुस्लिमों को लेकर पिछले काफी समय से कड़ाई दिखाता रहा है. हालांकि चीन के नागरिकता कानून काफी कड़े हैं. आमतौर पर चीन शायद ही विदेशियों को नागरिकता देता है. वहां बड़े पैमाने पर ऐसे लोग रहते हैं, जो परमिट आधार पर रहते हैं. उनका परमिट हर साल रिन्यू होता है. यहां तक बहुत से विदेशियों ने चीन में चीनी लड़कियों या लड़कों से शादी कर ली है लेकिन इसके बाद उन्हें नागरिकता नहीं मिल पाती, उन्हें परमिट पर ही रहना होता है.
पाकिस्तान और बांग्लादेश मुस्लिम राष्ट्र हैं. लेकिन नागरिकता देने के सवाल पर वो मुसलमानों को वरीयता नहीं देते. पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान अपने यहां इस्लाम को राष्ट्रीय धर्म मानते हैं. लेकिन वो दूसरे देशों में रह रहे मुस्लिम अल्पसंख्यकों की जिम्मेदारी नहीं लेते. यहां तक कि बंटवारे के कुछ वर्ष बाद पाकिस्तान ने मुस्लिम शरणार्थियों को अपने यहां लेने से इनकार कर दिया था. बंटवारे के बाद पहले जो परमिट सिस्टम बना था, वो जल्द ही पासपोर्ट सिस्टम में बदल गया. पाकिस्तान ने दक्षिण एशिया के मुसलमानों को नागरिकता देने की कोई गारंटी नहीं ली. 1956 में पाकिस्तान इस्लामिक राष्ट्र बना और इस्लामिक राष्ट्र बनने के बाद भी पाकिस्तान में यही पॉलिसी चलती रही. बांग्लादेश भी इसी नक्शे-कदम पर चला. नागरिकता देने में वो मुसलमानों को किसी भी तरह की वरीयता नहीं देता है. भारत में रहने वाले मुसलमानों को पाकिस्तान या बांग्लादेश जाने पर धर्म के आधार पर कोई राहत नहीं मिलती. नियम-कायदों के मुताबिक उन्हें भी वीजा हासिल करना पड़ता है. वीजा मिलने के बाद ही भारतीय मुसलमान पाकिस्तान या बांग्लादेश जा सकते हैं.

क्या भारत इजराइल के नक्शे कदम पर चल रहा है?

इजराइल में नागरिकता कानून चार आधार पर काम करता है. रिटर्न यानि दुनियाभर में जहां कहीं यहूदी रह रहे हों और वो इजराइल आकर रहना चाहें तो उन्हें इजराइल की नागरिकता दी जाएगी.
दूसरा आधार निवास है यानि इजराइल के भौगोलिक इलाके में जो भी लोग
1949 से रह रहे हैं, वो वहां की नागरिकता के अधिकारी हैं.
तीसरा आधार जन्म का है. जिसका जन्म इजराइल की धरती पर होगा
, वो वहां का नागरिक माना जाएगा.
चौथा आधार न्यूट्रलाइजेशन है यानी इनसे परे अगर इजराइल किसी को नागरिकता देना चाहे तो उसे नागरिकता दे सकता है.
इस दुनिया में २३० करोड़ ईसाई धर्म को मानने वाले हैं, यानि विश्व की कुल जनसंख्या का ३२ प्रतिशत, इस्लाम को मानने वाले १७० करोड़ हैं जो पूरे विश्व की कुल जनसंख्या के २४ प्रतिशत हैं, हिन्दू धर्म को मानने वाले ११० करोड़ हैं, जो विश्व की जनसंख्या का १४ प्रतिशत हैं. बौद्ध धर्म को मानने वाले ४० करोड़ हैं जो विश्व की जनसंख्या के 5.5 प्रतिशत है. पुरे विश्व में सिख धर्म 2.5 करोड़ है, कुल यहूदी 1.5 करोड़ हैं. पूरे विश्व में 56 मुस्लिम देश हैं.
भारत ने अभी तक ऐसा कोई कानून नहीं बनाया है कि जिसके तहत दुनिया में कहीं भी रहने वाले हिन्दू, सिख, बौद्ध अथवा जैन को भारत की नागरिकता दी जा सके. दूसरी बात यह है कि अगर ऐसा होता भी है तो इसे गलत नहीं ठहराया जा सकता है, क्योंकी केवल भारत ही एकमात्र देश है जहाँ से इन लोगों (हिन्दू, सिख, बौद्ध और जैन) की सांस्कृतिक पहचान जुड़ी हुई है, और भारत ही इन लोगों की सही पहचान इन्हें दे सकता है.

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