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इरफान हबीब: जिन्ना की नाजायज़ सोच की उपज है

अवध (उत्तर प्रदेश) के एक सामंती परिवार में जन्मे प्रोफेसर इरफान हबीब जितने कट्टर मार्क्सवादी हैं उतने ही कट्टर इस्लामी चरमपंथी भी । यह उनके शब्दों और कार्यों से लगातार झलकता भी है और साबित भी होता है । यही कारण है कि उन्होंने 28/12/2019 को कन्नूर (केरल) में भारतीय ऐतिहासिक कांग्रेस के मुख्य अतिथि केरल के राज्यपाल और प्रख्यात धर्मनिरपेक्ष और देशभक्त सुन्नी, मोहम्मद आरिफ खान के भाषण को बेहूदे और अभद्र रूप से बाधित किया। शोधकर्ताओं और बुद्धिजीवियों के उस गरिमामय सम्मेलन के उद्घाटन समारोह में हर सज्जन और अकादमिक विद्वान ने उसभयावह कृत्य से असहमति जताई। आमंत्रित राज्यपाल का अपमान करने और उन्हें अपने विचार व्यक्त करने से रोककर इरफान हबीब ने अंतिमतः सिद्ध कर दिया वे केवल और केवल एक सांप्रदायिक मुस्लिम हैं। कमाल है, वे अपने ही एक मुस्लिम भाई की धर्मनिरपेक्ष टिप्पणियों को बर्दाश्त नहीं कर पाए। साफ़ है कि हबीब कार्ल मार्क्स की नास्तिकता और पैगंबर मोहम्मद के धर्म की गजब काकटेल हैं।

वैदिक इतिहास को विकृत रूप में प्रस्तुत करने वाले इरफ़ान हबीब को 2005 में सोनिया गांधी के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार ने पद्मभूषण से सम्मानित किया था । हबीब को उन सरदार मनमोहन सिंह द्वारा सम्मानित किया गया था, जिन्होंने एक बार कहा था कि मुसलमानों का भारत के संसाधनों और वित्त पर पहला हक़ है। हबीब उस अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के उत्पाद है जिसे, जिन्ना ने "पाकिस्तानी विचारों का शस्त्रागार" कहा था। एएमयू की स्थापना सर सैयद अहमद ने की थी, जिन्होंने 1857 में आजादी के पहले युद्ध के दौरान राष्ट्रवादी सम्राट बहादुर शाह जफर के खिलाफ ब्रिटिश साम्राज्यवादियों का समर्थन किया था। यह प्रोफेसर हबीब ही हैं, जिन्होंने श्रीमती रोमिला थापर के साथ मिलकर भारत के गौरवशाली इतिहास को विकृत करने का काम किया, अयोध्या के बारे में झूठ बोला। वह तो भला हो प्रख्यात पुरातत्वविद के.के. मुहम्मद का जिन्होंने अपने शोध के माध्यम से सिद्ध कर दिया कि हबीब और थापर दोनों ने उन ऐतिहासिक तथ्यों को छुपाया था, जिससे प्रमाणित होता है कि बाबरी मस्जिद एक हिंदू मंदिर के अवशेषों पर बनाई गई थी। हबीब ने तो पूर्व में भारतीय ऐतिहासिक कांग्रेस में ही मांग की थी कि अयोध्या में राम जन्म भूमि पर खुदाई की कोई आवश्यकता ही नहीं है, लेकिन अदालत ने हबीब की मांग खारिज कर दी थी ।जो कुछ प्रोफेसर हबीब ने द्वारा भारतीय ऐतिहासिक कांग्रेस के मंच पर किया, वह व्यवहार एक बुद्धिजीवी का नहीं, बल्कि किसी सड़कछाप मवाली का ही कहा जा सकता है ।

आईये अब दूसरे मुसलमान की बात करते हैं।
केरल के राज्यपाल मो. आरिफ खान भी अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में ही पढ़े हैं, 
इसलिए पूछा जाना चाहिए कि इरफान हबीब जैसे इस्लामी कट्टरपंथी को आरिफ मोहम्मद खान जैसे धर्मनिष्ठ सुन्नी की धर्मनिरपेक्षता पर सवाल उठाने का क्या हक़ है ?
जय भारतीय केसरिया वाहनी
नोट : भारतीय केसरिया वाहिनी के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री मनोज श्रीवास्तव के फेसबुक पोस्ट से साभार

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