सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

स्वामी विवेकानंद के अनुसार “लक्ष्य के अभाव में हमारी ९९ प्रतिशत शक्तियाँ इधर-उधर बिखरकर नष्ट होती रहती हैं



युवा ह्रदय सम्राट स्वामी विवेकानंद कहते हैं- “बालकों तुम दृढ़ बने रहो, मेरी संतानों में से कोई भी कायर न बने. तुम लोगों में जो सबसे अधिक साहसी है सदा उसी का साथ करो. बिना विघ्न बाधाओं के क्या कभी कोई महान कार्य हो सकता है, धैर्य तथा अदम्य इच्छा-शक्ति से ही कार्य हुआ करता है. मैं तो लोहे के सदृश दृढ़ इच्छा-शक्ति सम्पन्न हृदय चाहता हूँ जो कभी कंपित न हो. दृढ़ता के साथ लगे रहो, ईश्वर तुम्हें आशीर्वाद दे. हे युवाओं! तुम उस सर्वशक्तिमान की संतानें हो. तुम उस अनंत दिव्य अग्नि की चिंगारियां हो.” वह कहते हैं- “हर आत्मा मूलरूप में देवस्वरूप है और लक्ष्य इस दिव्यता को जगाना है (Each soul is potentially divine and the goal is to manifest this divine)”. स्वामी विवेकानंद के अनुसार “लक्ष्य के अभाव में हमारी ९९ प्रतिशत शक्तियाँ इधर-उधर बिखरकर नष्ट होती रहती हैं. अध्यात्मिक आदर्श के अभाव में हम अपनी अंतर्निहित दिव्यता एवं पूर्णता को भुलाकर देह-मन तक ही अपना परिचय मान बैठते हैं. हमारे समस्त दु:खों, कष्टों और विषादों का मूल कारण यह आत्मविस्मृति ही है. यह अज्ञान ही सब दुःख-बुराइयों की जड़ है. इसी कारण हम स्वयं को पापी, दीन-हीन और दुष्ट-दरिद्र मान बैठे हैं और दूसरों के प्रति भी ऐसी ही धारणा रखते हैं तथा इसका एकमात्र समाधान अपनी दिव्य प्रकृति एवं आत्मशक्ति का जागरण है”. वह जोर देते हुए कहते हैं कि “आध्यात्मिक और मात्र आध्यात्मिक ज्ञान ही हमारे दुःख व मुसीबतों को सदैव के लिए समाप्त कर सकता है.” स्वामी जी कहते हैं कि “जब समस्त शक्ति, समस्त समस्याओं के समाधान का स्रोत तुम्हारे अंदर विद्यमान है, तो फिर सुख-भोगों और उपलब्धियों के पीछे यह अंतहीन भटकाव कैसा? इन्द्रिय सुख एवं भोगों की इस अंधी दौड़ का कोई अंत भी तो नहीं. अस्तित्व की पूर्ण आहुति देने पर भी यह आग शांत होने वाली नहीं.” स्वामी विवेकानंद युवाशक्ति में ऊर्जा का संचार करते हुए कहते हैं- “मैं जानता हूँ, मार्ग बहुत कठिन है, किन्तु यदि तुम्हारे अंदर आदर्श की अग्नि प्रदीप्त है तो चिंता की कोई बात नहीं है. ऐसे में मार्ग की असफलताएं, इनकी परवाह मत करो. वे तो स्वभाविक हैं और वे तो जीवन का सौन्दर्य हैं. जीवन के इस संग्राम में धूल-मिट्टी का उड़ना तो स्वभाविक ही है और जो इस धूल को सहन नहीं कर सकता, वह आगे कैसे बढ़ेगा.
आज के युवाओं के लिए स्वामी विवेकानंद से अच्छा और सच्चा उदाहरण कोई नहीं हो सकता. आज इस देश को पुनः एक स्वामी विवेकानंद की आवश्यकता है.

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

संविधान सभा की बहसों में छिपा भारत का असली सपना

संविधान निर्माण की प्रक्रिया, प्रमुख बहसें, और उन विवादों का विश्लेषण जो आज भी प्रासंगिक हैं संविधान सभा की बहसों में छिपा भारत का असली सपना  एक राष्ट्र की नींव 26 जनवरी 1950 को भारत ने अपना संविधान लागू किया। यह केवल एक कानूनी दस्तावेज़ नहीं था, बल्कि एक नवजात राष्ट्र का सामूहिक सपना था। इस संविधान को बनाने में 2 वर्ष, 11 महीने और 18 दिन का समय लगा। संविधान सभा में कुल 165 बैठकें हुईं, जिनमें से 114 दिन केवल संविधान के प्रारूप पर विचार-विमर्श में व्यतीत हुए। यह विश्व के किसी भी लोकतांत्रिक संविधान निर्माण की सबसे लंबी और सबसे गहन बहस थी। संविधान सभा की बहसों में भारत का वास्तविक स्वरूप उभरकर आया। यहाँ केवल कानूनी धाराएँ नहीं लिखी गईं, बल्कि एक बहुलतावादी, धर्मनिरपेक्ष और समतामूलक समाज की कल्पना को मूर्त रूप दिया गया। इन बहसों में जो तर्क-वितर्क हुए, जो असहमतियाँ व्यक्त हुईं, और जो समझौते किए गए, वे आज भी भारतीय लोकतंत्र की समझ के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। संविधान सभा की संरचना: प्रतिनिधित्व का गणित संविधान सभा का गठन कैबिनेट मिशन योजना 1946 के...

UGC विनियम 2026: उच्च शिक्षा में समानता का नया ढांचा (भाग-1)

UGC विनियम 2026 ऐतिहासिक संदर्भ और बदलाव का दौर भारतीय उच्च शिक्षा व्यवस्था में एक नया अध्याय शुरू हो चुका है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा जारी 'उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा देना विनियम, 2026' न केवल एक प्रशासनिक सुधार है, बल्कि यह भारतीय समाज की सबसे गहरी जड़ों में छिपे भेदभाव और असमानता से निपटने का एक महत्वाकांक्षी प्रयास है। यह लेख श्रृंखला इन नए नियमों की गहन पड़ताल करती है - न केवल उनकी संरचना और प्रावधानों की, बल्कि उनके पीछे के सामाजिक-राजनीतिक संदर्भ, संभावित परिणामों और विवादास्पद पहलुओं की भी। 2012 से 2026 तक का सफर: तीन चरणों में बदलाव भारतीय परिसरों में जातिगत और सामाजिक भेदभाव को रोकने के प्रयास कोई नई बात नहीं हैं। 2012 में UGC ने पहली बार 'SC/ST के छात्रों के खिलाफ भेदभाव की रोकथाम के लिए विनियम' जारी किए थे। उस समय का फोकस मुख्य रूप से अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के छात्रों तक सीमित था। 2024 में एक ड्राफ्ट सामने आया जिसमें पहली बार अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) को भी शामिल करने का प्रस्ताव रखा गया। लेकिन उस ड्...

गंगा स्नान का वैज्ञानिक महत्व : एक प्रमाणिक और गहन विश्लेषण

  गंगा स्नान को धार्मिक आस्था का विषय माना जाता है — लेकिन इसका एक ठोस वैज्ञानिक आधार भी है, जिसे आधुनिक शोधों ने प्रमाणित किया है। 1. प्राकृतिक एंटीबायोटिक जल गंगाजल में Bacteriophage नामक वायरस पाए जाते हैं, जो हानिकारक बैक्टीरिया को नष्ट कर देते हैं। इसलिए यह पानी सड़ता नहीं, बल्कि शुद्ध बना रहता है — यह आधुनिक माइक्रोबियल साइंस द्वारा प्रमाणित किया जा चुका है।  इसे भी पढ़ें : कार्तिक पूर्णिमा पर स्नान का वैज्ञानिक और आध्यात्मिक महत्व  2. स्किन एवं इम्यून सिस्टम के लिए लाभकारी गंगाजल में विद्यमान खास खनिज (Mineral Salts) व प्राकृतिक माइक्रोब्स त्वचा की मृत कोशिकाओं को हटाते हैं और त्वचा रोगों में उपचारकारी पाए गए हैं। इससे शरीर की immune response क्षमता बढ़ती है — विशेषकर जल-ज्वर, फंगल और फोड़े-फुंसियों जैसे संक्रमणों से लड़ने में। 3. नेगेटिव आयन एनर्जी थैरेपी (Negative Ion Therapy) जब व्यक्ति सूर्योदय या प्रातःकालीन मौसम में गंगा में स्नान करता है, तब उसे नेगेटिव आयन (−IONs) प्राप्त होते हैं — यह वही आयन हैं जो हिमालय, झरनों और बारिश के बाद की हवा में होते हैं। विज्ञान...