सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

मजहब ही सिखाता है आपस में बैर रखना- सम्प्रदायवाद ही धर्म का राजनीतिक व्यापार है


सर सय्यद अहमद खान ने भी कहा था- “सच्चा धर्म महज नैतिक मूल्यों का मुख्य सिद्धांत के बतौर प्रतिपादन करता है और कभी-कभी ही इस दुनिया की समस्याओं पर विचार करता है.” 
अल्लामा इक़बाल ने कहा था “मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना.” हालाँकि बाद में इन्हीं इक़बाल ने इस्लाम को सर्वश्रेष्ठ धर्म, मुसलमान को सर्वश्रेष्ठ मानव और इस्लामी बन्धुत्व को राष्ट्रीयता का श्रेष्ठतम रूप बताया था. आजकल धार्मिक स्वतंत्रता और धर्म-निरपेक्षता जैसे शब्दों की आड़ में जिस प्रकार इस देश की एकता, अखंडता और संस्कृति को आघात पहुँचाया जा रहा है, धार्मिक उन्माद फैलाया जा रहा है, सडकों पर हिंसा, आगजनी और सरकारी सम्पत्ति को सीधा निशाना बनाया जा रहा है. ये लोग कौन हैं? क्या यह धार्मिक हैं या साम्प्रदायिक?
धर्म शब्द की व्युत्पत्ति संस्कृत व्याकरण के “निरुक्त” के अनुसार “धृ” धातु से हुई है, जिसका तात्पर्य होता है-
धारण करना. जो नियम, साधुता, भक्ति, न्याय, कर्तव्य और व्यवस्था को धारण करता है वही धर्म कहलाता है. नैतिक मूल्यों का आचरण ही धर्म है. धर्म वह पवित्र अनुष्ठान है, जिससे चेतना का शुद्धिकरण होता है.
महर्षि वेदव्यास के अनुसार- “प्रकृति के साथ-साथ व्यक्ति, राष्ट्र एवं लोक-परलोक सबको धारण करने का शाश्वत नियम ही धर्म है.” निष्कर्षतः इसीलिए जो धार्मिक व्यक्ति होता है वह सदैव एक अच्छा नागरिक भी होता है.
इसके विपरीत सम्प्रदाय या साम्प्रदायिकता मूलरूप से एक विचारधारा है, जो धर्म से भिन्न होती है. यह एक विचारधारा है, एक दृष्टि है, जो समाज के विभिन्न मुद्दों पर- धर्म, संस्कृति, राष्ट्र, राजनीति, धर्मनिरपेक्षता, इतिहास व समाज के अन्य पहलुओं पर अपना मत व्यक्त करती है और अपनी इस प्रणाली से वह लगातार समाज में सक्रिय रहती है. साम्प्रदायिकता एक ऐसी विचारधारा है जो अपनी राजनीति का आधार धर्म को बनाती है. धर्म एक विश्वास प्रणाली है और अपने व्यक्तिगत विश्वासों के अंग के रूप में मनुष्य उसका पालन करता है, इसके विपरीत सम्प्रदायवाद, धर्म पर आधारित सामाजिक और राजनीतिक पहचान की विचारधारा का नाम है.
कड़वी सच्चाई यह है कि साम्प्रदायिकता, धर्म का इस्तेमाल करती है, धर्म के साथ जुड़ी संकीर्णता, धर्म का पिछड़ापन व अन्धविश्वास की खुराक लेकर वह समाज में वैधता बनाने की कोशिश करती है और लोगों को अपने साथ जोड़ने में कामयाब हो जाती है. वास्तव में, साम्प्रदायिकता का धर्म से कोई लेना-देना नहीं है, बल्कि वह धर्म की गलत व्याख्या करके उसको भी विकृत कर देती है. सम्प्रदायवाद का एक बहुत सही वर्णन यह किया जाता है कि यह धर्म का राजनीतिक व्यापार है.
सच्चा धार्मिक या सच्चे अर्थों में धर्म को मानने वाला कभी साम्प्रदायिक नहीं हो सकता और साम्प्रदायिक व्यक्ति कभी धार्मिक हो ही नहीं सकता, लेकिन वह धार्मिक होने का ढोंग अवश्य करता है.
आज इस देश में जो लोग सडकों पर तोड़फोड़ कर रहे हैं, आगजनी कर रहे हैं, पत्थरबाजी कर रहे हैं, यह लोग धार्मिक तो कतई नहीं हो सकते, अलबत्ता साम्प्रदायिक जरूर हैं. इन लोगों को देखकर यह कहना अतिशयोक्ति न होगी- मजहब ही सिखाता है आपस में बैर रखना.

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

संविधान सभा की बहसों में छिपा भारत का असली सपना

संविधान निर्माण की प्रक्रिया, प्रमुख बहसें, और उन विवादों का विश्लेषण जो आज भी प्रासंगिक हैं संविधान सभा की बहसों में छिपा भारत का असली सपना  एक राष्ट्र की नींव 26 जनवरी 1950 को भारत ने अपना संविधान लागू किया। यह केवल एक कानूनी दस्तावेज़ नहीं था, बल्कि एक नवजात राष्ट्र का सामूहिक सपना था। इस संविधान को बनाने में 2 वर्ष, 11 महीने और 18 दिन का समय लगा। संविधान सभा में कुल 165 बैठकें हुईं, जिनमें से 114 दिन केवल संविधान के प्रारूप पर विचार-विमर्श में व्यतीत हुए। यह विश्व के किसी भी लोकतांत्रिक संविधान निर्माण की सबसे लंबी और सबसे गहन बहस थी। संविधान सभा की बहसों में भारत का वास्तविक स्वरूप उभरकर आया। यहाँ केवल कानूनी धाराएँ नहीं लिखी गईं, बल्कि एक बहुलतावादी, धर्मनिरपेक्ष और समतामूलक समाज की कल्पना को मूर्त रूप दिया गया। इन बहसों में जो तर्क-वितर्क हुए, जो असहमतियाँ व्यक्त हुईं, और जो समझौते किए गए, वे आज भी भारतीय लोकतंत्र की समझ के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। संविधान सभा की संरचना: प्रतिनिधित्व का गणित संविधान सभा का गठन कैबिनेट मिशन योजना 1946 के...

UGC विनियम 2026: उच्च शिक्षा में समानता का नया ढांचा (भाग-1)

UGC विनियम 2026 ऐतिहासिक संदर्भ और बदलाव का दौर भारतीय उच्च शिक्षा व्यवस्था में एक नया अध्याय शुरू हो चुका है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा जारी 'उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा देना विनियम, 2026' न केवल एक प्रशासनिक सुधार है, बल्कि यह भारतीय समाज की सबसे गहरी जड़ों में छिपे भेदभाव और असमानता से निपटने का एक महत्वाकांक्षी प्रयास है। यह लेख श्रृंखला इन नए नियमों की गहन पड़ताल करती है - न केवल उनकी संरचना और प्रावधानों की, बल्कि उनके पीछे के सामाजिक-राजनीतिक संदर्भ, संभावित परिणामों और विवादास्पद पहलुओं की भी। 2012 से 2026 तक का सफर: तीन चरणों में बदलाव भारतीय परिसरों में जातिगत और सामाजिक भेदभाव को रोकने के प्रयास कोई नई बात नहीं हैं। 2012 में UGC ने पहली बार 'SC/ST के छात्रों के खिलाफ भेदभाव की रोकथाम के लिए विनियम' जारी किए थे। उस समय का फोकस मुख्य रूप से अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के छात्रों तक सीमित था। 2024 में एक ड्राफ्ट सामने आया जिसमें पहली बार अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) को भी शामिल करने का प्रस्ताव रखा गया। लेकिन उस ड्...

गंगा स्नान का वैज्ञानिक महत्व : एक प्रमाणिक और गहन विश्लेषण

  गंगा स्नान को धार्मिक आस्था का विषय माना जाता है — लेकिन इसका एक ठोस वैज्ञानिक आधार भी है, जिसे आधुनिक शोधों ने प्रमाणित किया है। 1. प्राकृतिक एंटीबायोटिक जल गंगाजल में Bacteriophage नामक वायरस पाए जाते हैं, जो हानिकारक बैक्टीरिया को नष्ट कर देते हैं। इसलिए यह पानी सड़ता नहीं, बल्कि शुद्ध बना रहता है — यह आधुनिक माइक्रोबियल साइंस द्वारा प्रमाणित किया जा चुका है।  इसे भी पढ़ें : कार्तिक पूर्णिमा पर स्नान का वैज्ञानिक और आध्यात्मिक महत्व  2. स्किन एवं इम्यून सिस्टम के लिए लाभकारी गंगाजल में विद्यमान खास खनिज (Mineral Salts) व प्राकृतिक माइक्रोब्स त्वचा की मृत कोशिकाओं को हटाते हैं और त्वचा रोगों में उपचारकारी पाए गए हैं। इससे शरीर की immune response क्षमता बढ़ती है — विशेषकर जल-ज्वर, फंगल और फोड़े-फुंसियों जैसे संक्रमणों से लड़ने में। 3. नेगेटिव आयन एनर्जी थैरेपी (Negative Ion Therapy) जब व्यक्ति सूर्योदय या प्रातःकालीन मौसम में गंगा में स्नान करता है, तब उसे नेगेटिव आयन (−IONs) प्राप्त होते हैं — यह वही आयन हैं जो हिमालय, झरनों और बारिश के बाद की हवा में होते हैं। विज्ञान...