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*अधिक पढालिखा हिन्दू अपने ही धर्म का विरोध क्यों करने लगता है*

दुनिया के किसी भी दूसरे धर्म का व्यक्ति जितना पढ़-लिखकर विद्वान बनता जाता है, वह उतना ही अधिक अपने धर्म के प्रति निष्ठावान और जागरूक होता जाता है। वह न स्वयं जागरूक होता है वरन अपने ही जैसे दूसरे लोगों को भी जागरूक करने का प्रयास करता है। वह अपने धर्म की तमाम अच्छाइयों को दुनिया-समाज के समक्ष लाने का प्रयास करता है और अपने धर्म में फैली बुराइयों को ढककर रखते हुए उन्हें स्वयं ही दूर करने का प्रयास करता है। 
किंतु इसके ठीक उलट हिन्दू धर्म के लोग जितना पढ़ते-लिखते रहते हैं, वह उतना ही अधिक अपने धर्म का विरोध करते हैं, वह न केवल अपने धर्मशास्त्रों और रीति-रिवाजों में बुराइयाँ ढूंढते हैं वरन उनको दुनिया-समाज के समक्ष लाकर उनका मख़ौल उड़ाने का कुत्सित प्रयास भी करते हैं। इतना ही परन्तु अपने महापुरुषों, पूर्वजों के बनाये हुए नियम-सिद्धान्तों में भी खोट निकालकर उन्हें गलत सिद्ध करने का षड्यंत्र भी लगातार रचते रहते हैं।
एक मुस्लिम व्यक्ति वामपंथी होते हुए भी नमाज़ और रोजा नहीं छोड़ता लेकिन एक हिन्दू यदि वामपंथी बन जाता है तो वह सर्वप्रथम अपनी संस्कृति और संस्कारों को ही भूल जाता है। 
आप किसी भी दूसरे धर्म के विषय में जरा सी भी टीका-टिप्पणी नहीं कर सकते परन्तु सनातन धर्म का मज़ाक बनाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ता, ऐसे लोगों का कोई विरोध नहीं किया जाता, बल्कि उन्हें प्रोत्साहित किया जाता है।
आप किसी भी मंदिर के पुरोहित, किसी मठ के मठाधीश, महंत अथवा साधु-संत पर टिप्पणियां कर  सकते हैं लेकिन क्या कभी आपने किसी मुल्ला-मौलवी, किसी चर्च के पादरी पर कोई टीका-टिप्पणी करने का प्रयास किया है, कभी करके देखिए तुरन्त गर्दन का नाप ले लिया जाएगा।
यहां यह कहने का आशय कदापि नहीं है कि आप किसी भी धर्मगुरु का अपमान करें बल्कि यह समझाने का प्रयास भर है कि आप अपने धर्मगुरुओं, विद्वानों का यथासम्भव सम्मान करने और करवाने का प्रयास कीजिये।
अपने सनातन धर्म के ज्ञान-विज्ञान को समझने और उसपर गहनता से विचार करने का प्रयास करना ही चाहिए। 
यह हर पढ़ेलिखे व्यक्ति का दायित्व है कि वह अपने धर्म के प्रति न केवल स्वयं जागरूक हो बल्कि दूसरों को भी जागरूक करे।

-पंडित मनोज चतुर्वेदी शास्त्री

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