राष्ट्रद्रोहियों का नया चेहरा और भारतीय सहनशीलता की सीमा भारत के इतिहास में विदेशी आक्रमणों से अधिक विनाश भीतर के गद्दारों ने किया है। राजा दाहिर को तो बाहर से आक्रमण ने मारा, लेकिन पृथ्वीराज चौहान, महाराणा प्रताप, झाँसी की रानी — सभी को अपने ही दरबार में छिपे साँपों ने डसा। आज 21वीं सदी का भारत भी वही गलती दोहरा रहा है — आस्तीन के साँपों को “अल्पसंख्यक अधिकार” कहकर पाल रहा है। हमारे अन्य राजनीतिक लेख मुस्लिम वोटबैंक और कांग्रेस का मिथक:बदलते भारत का सच राहुल गांधी का "हाइड्रोजन" बम: कांग्रेस की रणनीतिक विफलता वसुधैव कुटुंबकम बनाम मुस्लिम ब्रदरहुड : दो सभ्यताओं की वैचारिक टकराहट राजनीतिक तुष्टिकरण: वोटों की खातिर गद्दारों का पोषण भारत में कुछ दलों ने “ धर्मनिरपेक्षता ” के नाम पर राष्ट्र-विरोध को राजनीतिक पूँजी बना लिया है कश्मीर में पत्थरबाज़ों को “मासूम नौजवान” कहने वाले, आतंकी मुठभेड़ों पर “फर्जी एनकाउंटर” का शोर मचाने वाले, और पाकिस्तान को ...
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