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शुक्रवार, 26 जून 2020

क्या भारत का संविधान मूर्तिपूजा को अनुचित मानता है?

आजकल मूर्तिपूजा को लेकर कई आपत्तिजनक बयान आ रहे हैं, जिसे देखो मुहं उठाकर मूर्तिपूजा और मूर्तिपूजकों के ख़िलाफ़ बोलना शुरू कर देता है और पुलिस-प्रशासन के साथ-साथ हमारी सरकारें भी उसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का नाम देकर पल्ला झाड़ देते हैं। क्या यह सनातन धर्म और मूर्तिपूजकों की आस्था और उनकी श्रद्धा का खुला अपमान नहीं है? 

अभी हाल ही में एक राष्ट्रीय चैनल के एक पत्रकार ने ख़्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती को लेकर कोई टिपण्णी कर दी थी जिसे लेकर उनके मानने वालों में खूब रोष देखने को मिला था और उन पत्रकार महोदय की गिरफ्तारी की मांग भी उठी थी। इससे पहले भी कई बार इस प्रकार की घटनाएं हो चुकी हैं, जिनमें एक-दो लोगों को धार्मिक आस्था को चोट पहुंचाने के नाम पर कत्ल भी कर दिया गया। जिसमें एक प्रमुख नाम हुतात्मा कमलेश तिवारी का  भी है।
*प्रश्न यह नहीं कि मूर्ति पूजा का विरोध कौन कर रहा है, बल्कि प्रश्न यह है कि उन्हें विरोध करने की खुली छूट कौन और क्यों दे रहा है? प्रश्न यह भी है कि श्रीराम मंदिर को मुद्दा बनाकर दो बार पूर्ण बहुमत से सत्ता प्राप्त कर चुकी भाजपा भी मूर्तिपूजा के विरोधियों की नाक में नकेल क्यों नहीं डाल पा रही है।* क्या संविधान इस बात की छूट देता है? एक तरफ आप कहते हैं कि हमारा देश सेक्युलरवादी है, और उसमें रहने वाले प्रत्येक नागरिक को धार्मिक स्वतंत्रता प्रदान की गई है, वह अपनी आस्था और श्रद्धानुसार अपनी संस्कृति, सभ्यता, संस्कारों, परम्पराओं और तीज-त्यौहारों का भलीभांति निर्वहन कर सकता है, तब क्या कारण है कि कोई प्रशांत कनौजिया, रमाकांत यादव या फिर कोई तथाकथित बुद्धिजीवी मूर्तिपूजा और मूर्तिपूजकों का सार्वजनिक रूप से मखौल उड़ा देता है।

यहां गौरतलब है कि मूर्तिपूजा का विरोध करने वाले अधिकांशतः लोग वही हैं जो बात-बात पर संविधान की दुहाई देते हैं, जिन्होंने हर चौराहों पर किसी न किसी की मूर्तियां लगवा रखी हैं, संविधान निर्माता, बापू, आयरन लेडी सहित कई नेताओं की मूर्तियां चौराहों पर लगवाने वाले जब मूर्तिपूजकों का अपमान करते हैं तो गुस्सा नहीं बल्कि हंसी आती है।
मूर्तियां और मंदिर तो महृषि वाल्मीकि, सन्त रविदास, बाबा भीमराव आंबेडकर के भी बनाये जाते हैं और बनाये जा रहे हैं। तब उनपर रोक क्यों नहीं लगवाई जा रही है?

दूसरे हैं आर्यसमाजी, जो खुलेआम मूर्तिपूजा का विरोध करते हैं और हिंदू धर्म की दुहाई देते हैं, क्यों? आप अपने को श्रेष्ठ कैसे कह सकते हैं जबकि आप स्वयं सनातन धर्म की मान्यताओं और मूर्तिपूजा अर्थात सगुण उपासना का घोर विरोध करते हैं। आप कैसे हिंदुओं और हिन्दू धर्म की ठेकेदारी ले सकते हैं, आर्यसमाज क्यों नहीं अपने दूसरे भाइयों का सम्मान नहीं करता? बौद्ध, जैन, सिख, आर्यसमाज और तमाम अन्य मत आखिर निकले तो सनातन धर्म से ही हैं, सनातन इन सभी मतों और सम्प्रदायों का मूल है। 
पीर-फकीरों की मजारों पर मत्था टेकने वाले भी मूर्तिपूजा का विरोध करते हैं, क्यों? 

यह हमारी आस्था और हमारे विश्वास का प्रश्न नहीं अपितु समस्त सनातन समाज और उसकी परम्पराओं, मर्यादा और संस्कृति का प्रश्न है।

समस्त सनातनियों और हिंदुओं को एकजुट होकर सरकार से ऐसे तमाम लोगों के विरुद्ध कड़ी से कड़ी कार्यवाही की मांग रखनी चाहिए जो सार्वजनिक रूप से मूर्तिपूजा और मूर्तिपूजकों पर आपत्तिजनक टिप्पणियां करते हैं। 

*-मनोज चतुर्वेदी "शास्त्री"*
राष्ट्रीय प्रवक्ता
भारतीय केसरिया वाहिनी
लखनऊ 

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गुरुवार, 25 जून 2020

गांधीवाद के खोखले अहिंसावादी आदर्शों की आड़ में कब तक छुपोगे

महात्मा गांधी ने कहा था कि "कोई तुम्हारे एक गाल पर थप्पड़ मारे तो तुम दूसरा गाल आगे कर दो". हमने उनके उस सिद्धान्त को अपना लिया और उसका नतीजा यह निकला कि 1947 से आज तक हम दोनों गालों पर कई बार थप्पड़ खा चुके हैं। बापू के अहिंसात्मक सिद्धान्त को हमने इतनी गम्भीरता से लिया कि हम कब नपुसंक हो गए यह हमें अभीतक समझ ही नहीं आया। हम शठे शाठ्यम समाचरते के नियम को भूल गए और हर बार थप्पड़ खाकर अपना गाल आगे करते गए। जिसके कारण पाकिस्तान जैसा दो कौड़ी का मुल्क जिसकी हमारे सामने कोई औक़ात न थी उसने भी हम पर कई बार हमला बोल दिया। 1948 से लेकर आज तक हम अपने वीर जवानों और भाई-बहनों की आहुति इस "गांधीवादी अहिंसात्मक यज्ञ" में चढ़ा चुके हैं। 

इंग्लिश में एक कहावत है "अटैक इज द बैस्ट डिफेंस" अर्थात आक्रमण ही सबसे अच्छी रक्षात्मक रणनीति है। परन्तु बापू ने तो हमें रक्षात्मक रहना भी नहीं सिखाया, उन्होंने तो केवल पिटना सिखाया। हम आक्रमण तो छोड़िए अब तो हम रक्षात्मक होना भी भूल गए। कभी चीन, कभी पाकिस्तान और अब तो नेपाल जैसा देश जिसको कल तक हिन्दुराष्ट्र का दर्जा मिला हुआ था वह भी हमें आंख दिखाने लगा है और दिखाए भी क्यों नहीं, हम ही ने तो उसे इस लायक बनाया। हमने दानवीरता दिखाते हुए चीन को 43000 वर्ग किमी भूमि दान में दे दी, अति उदारता का परिचय देते हुए पाकिस्तान को उसकी जीती हुई ज़मीन वापस लौटा दी और अपनी गंवा दी। क्यों? ये कोई नहीं जानता, शायद खुद गांधी परिवार के पास भी इन प्रश्नों के उत्तर न हों। 

मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम ने भी लंका पर चढ़ाई की थी, औऱ माता सीता को रावण के चंगुल से स्वतंत्र कराया था। योगपुरुष श्रीकृष्ण ने भी शिशुपाल पर सुदर्शन चक्र चलाया था, उन्होंने भी कंस का वध किया था। देवी दुर्गा ने भी परम आततायी महिषासुर को मृत्यु के घाट उतारा था। हमारे समस्त देवी-देवताओं के हाथों में जो अस्त्र-शस्त्र धारण कराए गए हैं वह इस बात का प्रतीक हैं कि आवश्यकता पड़ने पर उनका सदुपयोग किया ही जाना चाहिए। परन्तु 1947 के बाद से कांग्रेस और वामपंथियों ने हमारे पूर्वजों और देवी-देवताओं का मज़ाक बनाया, हमारी सभ्यता को पिछड़ा और जंगली बताया। हमें बताया गया कि महात्मा  गांधी ने बिना खड्ग, बिना ढाल के अंग्रेजों को भगा दिया और हम मूर्ख इस बात पर विश्वास भी करते हैं कि वास्तव में ऐसा ही हुआ होगा। बहुत चालाकी के साथ स्वतंत्र भारत का नायक गांधी और नेहरू को बना दिया गया जबकि काला पानी की सज़ा काटने वाले वीर सावरकर जैसे सच्चे और ईमानदार राष्ट्रभक्तों को खलनायक का दर्जा दे दिया गया।

हम कब तक यूं ही अपने वीर जवानों की शहादत पर आंसू बहाते रहेंगे, हम कब तक विश्वगुरु बनने के ख्याली पुलाव पकाते रहेंगे, आखिर कब तक हम कड़ी निंदा और आलोचना की चादर ओढ़कर अपना मुहं छुपाते रहेंगे? हम कब तक गांधीवाद के खोखले और अप्रासंगिक नियमों और सिद्धांतों की वेदी पर अपनी और अपनों की बलि चढ़ाते रहेंगे.

*-मनोज चतुर्वेदी "शास्त्री"*

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शनिवार, 20 जून 2020

केवल जेहादी और माओवादी ही सेना औऱ सरकार पर आक्षेप लगा रहे हैं

मेरे कुछ मित्र जानना चाहते हैं कि जब हमारे प्रधानमंत्री महोदय कहते हैं कि भारत-चीन बॉर्डर पर कोई दिक्कत नहीं है तो आखिर किस कारण से हमारे 20 सैनिक शहीद हो गए आखिर विवाद क्या और क्यों है?
मैं ऐसे तमाम लोगों को बताना चाहता हूं कि- विवाद इस बात का है कि कोरोना के कारण चीन में लगभग 1 करोड़ लोग मारे गए हैं, चीन में उईगर मुस्लिम समुदाय के लोगों को ग़ुलाम बनाकर रखा जा रहा है, चीन विश्व में पहले नम्बर की महाशक्ति बनना चाहता है, पाकिस्तान और नेपाल सरकारों ने चीन के समक्ष घुटने टेक दिए हैं, पाकिस्तान तो पूरी तरह से चीन का गुलाम बन चुका है, इमरान खान चीन का वफ़ादार कुत्ता बन गया है और उसके सारे मंत्री-सन्तरी चीनियों के समक्ष दुम हिलाते घूमते हैं।
1962 में जिस प्रकार तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने चीन के समक्ष आत्मसमर्पण सा कर दिया था, और हमारी 43000 वर्ग किमी भूमि को कब्ज़ा लिया था और उन्हीं कांग्रेसियों के आकाओं के परिवार के लोग जिस प्रकार से चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के साथ MOU मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग का एग्रीमेंट बनाकर आये थे और वामपंथी जो कि चीन के मानसिक ग़ुलाम हैं, खाते हमारा हैं और गाते चीन का हैं, इन सबको साथ लेकर चीन भारत की भूमि पर अवैध कब्ज़ा करना चाहता है। 
दरअसल इस देश में जाकिर हुसैन जैसे कई ग़द्दार कांग्रेसी और वामपंथी नेता चाहते हैं कि भारत के टुकड़े हों, और भारत कमज़ोर हो जाये। पाकिस्तान के टुकड़ों पर पलकर 72 हूरों की चाहत में यह अय्याश हमेशा भारत को गुलाम बनता हुआ देखना चाहते हैं।
दरअसल ये वह लोग हैं जो समझते हैं कि भारत पर उनके बाप मुगलों ने शासन किया था और भारत की जनता उनके जरखरीद ग़ुलाम थी, है और रहेगी। यह भारत के वफादार नहीं हैं बल्कि भारत के दुश्मनों के पले हुए कुत्ते हैं जो हमेशा अपने आकाओं के लिए भौंकते हैं। 
जिन्नावादी मानसिकता औऱ माओवादी मानसिकता के गुलाम यह चंद ग़द्दार चीन को हौवा बनाकर पेश कर रहे हैं। चीन पूरी दुनिया से अलग- थलग हो चुका है, पूरा विश्व जानता है कि चीन ही कोरोना महामारी का जनक है। अमेरिका और रूस विश्व की महाशक्ति हैं और बने रहना चाहते हैं लेकिन वह कोई भी युद्ध अपनी ज़मीन पर नहीं लड़ना चाहते हैं। ऐसे में भारत उनके लिए युद्ध का मैदान है। वह जानते हैं कि भारत अपनी सम्प्रभुता, एकता और अखंडता से कभी समझौता नहीं करेगा और एशिया में भारत ही एक अकेला ऐसा देश है जो सीधे-सीधे चीन को चुनौती दे सकता है।
एक और बात, वह यह कि चीन की जनसंख्या के अनुपात में वहां पर खेती योग्य भूमि बहुत कम है, इसलिए उसको उपजाऊ ज़मीन की आवश्यकता है जो उसे भारत में मिल सकती है। 

लद्दाख भारत का मुकुट है और हम अपना मुकुट किसी को नहीं दे सकते हैं। जो लोग पाकिस्तान, बांग्लादेश और चीन के टुकड़ों पर पल रहे हैं वही हमारी सेना औऱ सरकार पर अनर्गल सवालिया निशान लगा रहे हैं। आज भारत में रहने वाला हर सच्चा देशभक्त सरकार और सेना के साथ खड़ा है, और हमेशा खड़ा रहेगा। आज हर सच्चा मुसलमान अब्दुल हमीद है औऱ हर हिन्दू महाराणा प्रताप। 

जयहिंद, जयभारत

-मनोज चतुर्वेदी शास्त्री
9058118317

बुधवार, 10 जून 2020

क्या आप जानते हैं कि "पंडित" कौन है?

अक्सर हम लोग एक शब्द सुनते हैं "पंडित जी"। परन्तु क्या हम जानते हैं कि पंडित कौन है? 
दरअसल *पंडित काव वास्तविक अर्थ है विद्वान, स्कॉलर, बुद्धिजीवी अथवा किसी विषय विशेष में पारंगत होना। महात्मा विदुर ने पंडित अर्थात बुद्धिजीवी और मूढ़ चित्त अर्थात मूर्ख के जिन गुणों-अवगुणों का बखान किया है, वह मैं आपके समक्ष रखता हूँ-*

पंडित अर्थात बुद्धिजीवी के लक्षण-

*1. जो अच्छे कर्मों का सेवन करता है और बुरे कर्मों से दूर रहता है, साथ ही जो आस्तिक और श्रद्धालु है वह पंडित है।*

*2. जो किसी विषय को देर तक सुनता है किंतु शीघ्र ही समझ लेता है और उसे समझकर कर्तव्य बुद्धि से पुरुषार्थ में प्रवृत्त होता है, कामना से नहीं, अर्थात जो केवल अपने कर्म पर ध्यान करता है और फल की इच्छा नहीं करता वही पंडित है।*

*3. जो व्यक्ति बिना पूछे किसी दूसरे के विषय में कोई बात नहीं कहता अर्थात बिना मांगे सलाह न देना, पंडित की पहचान है।*

*4. जो पहले निश्चय करके फिर कार्य का आरंभ करता है, कार्यों के बीच में नहीं रुकता, समय को व्यर्थ नहीं जाने देता और चित्त को वश में रखता है वह पंडित है।*

*5. जो तर्क में निपुण और प्रतिभाशाली है और कभी कुतर्क नहीं देता वह पंडित है।*

*6. जिसकी बुद्धि उसकी विद्या का अनुसरण करती है और विद्या उसकी बुद्धि का तथा जो सदैव अपने से बड़ों का आदर-सम्मान करता है और अपने से छोटों का कभी अपमान नहीं करता वही पंडित है।*

जिस व्यक्ति में उपरोक्त समस्त गुण विद्यमान हैं वह ममहापण्डित हैं।

*-मनोज चतुर्वेदी "शास्त्री"*