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शुक्रवार, 6 मार्च 2020

जलाले बादशाही हो, या जम्हूरी तमाशा हो. अगर मजहब से खाली हो, तो रह जाती है खाकानी

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  अल्लामा इकबाल ने कहा है-
·         “जलाले बादशाही हो, या जम्हूरी तमाशा हो. अगर मजहब से खाली हो, तो रह जाती है खाकानी.” यह इस बात को स्पष्ट करता है कि इस्लाम धार्मिक शासन का पक्षधर है.
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इंदिरा गाँधी ने २ नवम्बर १९७६ को संविधान में ४२ वां संशोधन करके उसमें सेक्युलर शब्द जोड़ दिया था. हिंदी में इसके लिए धर्मनिरपेक्ष शब्द दिया गया है. जिसका शाब्दिक अर्थ धर्म+निरपेक्ष=धर्म से तटस्थ. अर्थात धर्म की अपेक्षा न रखना, धर्महीनता या नास्तिकता दुसरे शब्दों में काफ़िर. धर्मनिरपेक्ष वह है जो सभी धर्मों को समान मानता है. अर्थात सभी पंथों, सम्प्रदायों और मतों को एक समान मानना. वास्तव में यह परिभाषा केवल हिन्दू, बौद्ध, जैन और सिक्ख पंथों पर लागू होती है क्योंकि वह सब एक ही नदी सनातन हिन्दू धर्म की विभिन्न शाखाएं हैं. लेकिन किसी भी दृष्टिकोण से यह ईसाई, इस्लाम धर्मों पर लागू नहीं होती. यह शब्द भारतीय इतिहास में कहीं और कभी भी नहीं मिलता है. सच यह है कि वास्तव में यह शब्द एक विदेशी शब्द है जिसे स्व. इंदिरा गाँधी ने यह शब्द अपनी सत्ता को बचाने के लिए आयतित किया था.
·         “सेक्युलाजिम” शब्द को समझने के लिए इसके इतिहास को समझना होगा. जब इंग्लैण्ड के राजा हेनरी ८ वें (१४९१-१५४७) ने १५३३ में अपनी रानी कैथरीन को तलाक देने, और एन्ने बोलेन्न नाम की विधवा से शादी करने के लिए पॉप क्लीमेंट (७वें) ने साफ़ मना कर दिया. और हेनरी को धर्म से बहिष्कृत कर दिया. इस पर नाराज होकर हेनरी ने पॉप से विद्रोह कर दिया. इस पर नाराज होकर हेनरी ने पॉप से विद्रोह कर दिया.और अपने राज्य इंग्लैण्ड को पॉप की सत्ता से अलग करके, “चर्च ऑफ इंग्लैण्ड” की स्थापना कर दी. इसके लिए उसने १५३४ में इंग्लैंड की संसद में एक्ट ऑफ सुप्रिमैसी नाम का क़ानून पारित किया. जिसका शीर्षक था “सेपरेशन ऑफ चर्च एंड स्टेट” इसके मुताबिक चर्च न तो राज्य के कामों में हस्तक्षेप कर सकता था. और न ही राज्य चर्च के कामों में दखल दे सकता था. इस चर्च और राज्य के विलगाव के सिद्धांत का नाम उसने सेक्युलारिम रखा. अरबी शब्दकोश में इस शब्द का अर्थ धर्म से सम्बन्ध न रखनेवाला, यानि संसारी है.
यहाँ समझने वाली बात यह है कि इंदिरा गाँधी ने यह शब्द संविधान के मूल यानि प्रस्तावना में जोड़ा था लेकिन इससे पहले यह केवल संविधान के अनुच्छेद २५(२) में आया था, जिसमें राज्य को धार्मिक आचरण से सम्बद्ध किसी भी लौकिक क्रियाकलाप का विनिमयन या निर्बन्धन करने की शक्ति प्रदान की गई थी.
अब प्रश्न यह उठता है कि आखिर क्या कारण था कि संविधान निर्माताओं जिसमें खुद बाबा भीमराव अम्बेडकर भी शामिल थे, प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु ने भी इस “सेक्युलर” शब्द को संविधान की मूल प्रस्तावना में शामिल क्यों नहीं किया गया था. क्या भीमराव अम्बेडकर, जवाहर लाल नेहरु सेक्युलर नहीं थे? ये सवाल हम उन सब लोगों से पूछना चाहते हैं जो रात-दिन “सेक्युलरिज्म” की माला जपते रहते हैं. 

"कट्टरपंथी विचारधारा" को लेकर जो भविष्यवाणी की गई थी आज वह अक्षरशः सही होती नज़र आ रही है

श्रीमती एनी बेसेंट लिखती हैं- "ख़िलाफ़त आंदोलन (1919) के बाद से बहुत कुछ बदल गया है, और ख़िलाफ़त आंदोलन को प्रोत्साहन मिलने से भारत के लिए उत्पन्न हुए अनेक दुष्परिणामों में से एक यह है कि इस्लाम में विश्वास न रखने वालों के विरुद्ध मुसलमानों की घृणा की अंदरूनी भावना पूरी निर्लज्जता के साथ नग्न रूप में उभर आई है, जैसी कि वह बीते समय में थी। हमने सक्रिय राजनीति में तलवार के बल पर बढ़ने वाले इस्लाम के प्राचीन रूप को पुनर्जीवित होते देख लिया है। हमने मुस्लिम नेताओं को कहते सुना है कि यदि अफगानों ने भारत पर आक्रमण किया तो वे अपने मुसलमान भाइयों का साथ देंगे और शत्रुओं से मातृभूमि की रक्षा करते हिंदुओं की हत्या कर देंगे। हम देखने पर विवश हुए हैं कि मुसलमानों की प्रथम निष्ठा मुस्लिम देशों के प्रति है, अपनी मातृभूमि के लिए नहीं।
"भारत के स्वतंत्र होने पर, मुस्लिम समुदाय देश की स्वतंत्रता के लिए सामने खड़ी विप्पति बन जायेगा, क्योंकि अनजान जनसाधारण तो वही मानेंगे जो उन्हें पैगम्बर के नाम से बताया जाएगा और ऐसा करने वालों के पीछे ही वह चलेंगे। वे अफगानिस्तान, बलूचिस्तान, ईरान, इराक़, अरब, तुर्की, मिस्र और मध्य एशिया के मुस्लिम कबीलों के साथ मिलकर भारत में मुस्लिम राज लाने के लिए विद्रोह करेंगे।"
हम सोचते थे कि भारत के मुसलमान अपनी मातृभूमि के लिए निष्ठावान हैं और निःसन्देह, अब भी हमें आशा है कि शिक्षित लोगों में से अनेक इस मुस्लिम विद्रोह को रोकने का प्रयास करेंगे। परन्तु, वे प्रभावी प्रतिरोध कर पाने के लिए बहुत कम हैं, और उनको दीन के ग़द्दार बताकर क़त्ल कर दिया जाएगा।
(पुस्तक-डॉ. अम्बेडकर की दृष्टि में मुस्लिम कट्टरवाद, पृष्ठ 44)

दिल्ली हिंसा ने हमें बता दिया है कि इस्लामिक राज का अर्थ आज भी क्या है, अतः हम एक और "डायरेक्ट एक्शन दिवस" की प्रतीक्षा में नही बैठ सकते। ताहिर हुसैन, शाहरुख, जैसे हजारों-लाखों उग्र कट्टरपंथी भेड़ की खालों से बाहर आ चुके हैं, उनके चेहरों पर पड़े छद्म धर्मनिरपेक्षता के नक़ाब उतर चुके हैं। आज इस देश में जो हालात बन चुके हैं उनको देखते हुए यह कहना गलत न होगा कि वर्षों पहले जो भविष्यवाणी श्रीमती एनी बेसेंट ने "कट्टरपंथी मुस्लिम विचारधारा" को लेकर की थी आज वही अक्षरशः सही होती नज़र आ रही है। हालांकि अभी भी हालात काफी हद तक काबू में माने जा सकते हैं परन्तु भविष्य को पूरी तरह से सुरक्षित नहीं माना जा सकता है। हम कबूतर की तरह आंख बंद करके कब तक अपने आप को धोखा देते रहेंगे।