यह ब्लॉग खोजें

गुरुवार, 28 नवंबर 2019

*नाथूराम गोडसे को देशद्रोही कहने वालों, पहले अपने गिरेबाँ में झांककर तो देख लो*

नाथूराम गोडसे को देशभक्त कहने पर हंगामा कौन कर रहा है? वह लोग जो आतंकियों के नाम के साथ भी "जी" लगाकर सम्बोधित करते हैं, वह लोग जो जिन्ना को देशभक्त बताते हैं, वह लोग जो विदेशी आक्रमणकर्ताओं को समाज उद्धारक बताकर उनका महिमामंडन करते हैं, वह लोग जो आक्रमणकारी और अय्याश अकबर को महान बताते हैं, वह लोग जो अपने को बाबर का वंशज कहते हैं, वह लोग जो बाबर, हुमायूं, तुगलक जैसे आक्रमणकर्ताओं के नाम पर सड़कें और संस्थान बनवाते हैं, वह लोग जो अंग्रेजों के जाने के बाद भी अंग्रेजियत को नहीं छोड़ पाए, जो लोग आजतक शहीदे आजम भगत सिंह को "शहीद" का दर्जा नहीं दिला पाए, और तो और भगतसिंह को आतँकवादी बता दिया, जिन्हें "वन्देमातरम" बोलने पर एतराज़ है, जो लोग स्वामी श्रद्धानन्द, डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी, पंडित दीन दयाल उपाध्याय जैसी महान विभूतियों की वीरगति पर मुहं में दही जमाकर बैठ गए, जिन लोगों ने सदैव अपनी ही सभ्यता, अपनी संस्कृति और अपने महापुरुषों का मज़ाक़ बनाया, जो ऋषि-मुनियों को भी अपशब्द कहने से नहीं चूकते, जिन्होंने भारत माता को डायन कहा, जिन्होंने कश्मीर की आज़ादी की वक़ालत की, जिन्होंने हमारी सेना और सैनिकों के शौर्य और पराक्रम पर उंगलियां उठाई। 

वह लोग किस मुँह से नाथूराम गोडसे को देशभक्त कहने पर हायतौबा मचा रहे हैं, जिन लोगों ने मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के अस्तित्व को ही नकार दिया था जबकि स्वयं महात्मा गांधी अपने पूरे जीवनकाल "रघुपति राघव राजा राम..." का जप करते रहे।  बताया तो यहां तक जाता है कि अपने अंतिम क्षणों में भी गांधी जी के मुंह से "हे राम" निकला था। 

शर्म और ग़ैरत नाम की कोई चीज अगर है तो उपरोक्त सभी लोगों को यह आनी चाहिए।
अगर नाथूराम गोडसे देशद्रोही थे, तो स्वामी श्रद्धानन्द का हत्यारा अब्दुल रशीद भी देशद्रोही था, भारत पर आक्रमण करने वाले तमाम विदेशी आक्रांता चाहे वह बाबर हो, सिकन्दर हो, या फिर अंग्रेज या उनके वंशज यह सब देशद्रोही थे/हैं। जिन्नाभक्त और कश्मीर की आजादी के समर्थक सब के सब देशद्रोही हैं।
अकेले नाथूराम गोडसे को ही देशद्रोही नहीं बताया जा सकता, बल्कि वह प्रत्येक व्यक्ति देशद्रोही ही है जो इस देश के संविधान, इस देश के आदर्श पुरुष मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम को सम्मान नहीं देता, जो राष्ट्रीय आंदोलन के प्रेरक गीत औऱ राष्ट्रीय गीत "वन्देमातरम" को कहने से गुरेज करता है, जो इस देश के करोड़ों हिंदुओं को 15 मिनट में काटने की बात करते हैं, वह भी देशद्रोही हैं, जो माननीय सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की अवहेलना करते हुए उसका अपमान करते हैं। वह भी देशद्रोही हैं, जो लोग मुस्लिम और तमाम विदेशी आक्रांताओं को अपना आदर्श मानते हैं, वह सब देशद्रोही हैं।

स्वतन्त्रता संग्राम में महात्मा गांधी की भूमिका को कोई नहीं नकार सकता औऱ न ही उनकी हत्या को उचित ठहराया जा सकता है, इस बात से भी किसी को इन्कार नहीं है कि नाथूराम गोडसे ने जो किया वह संवैधानिक और सामाजिक दोनों ही दृष्टिकोण से अनुचित था। किंतु नाथूराम गोडसे को देशद्रोही कहने से पहले आप अपने गरेबान में झांक जरूर लीजिये।

*-पंडित मनोज चतुर्वेदी "शास्त्री"*

बुधवार, 27 नवंबर 2019

*महाराष्ट्र महाभारत: क्या भाजपा के बुरे दिन शुरू हो गए हैं*


पिछले कुछ समय से महाराष्ट्र में सत्ता के लिए जो महाभारत चल रहा था, उसमें लोकतन्त्र, संविधान, जनभावना, हिंदुत्व और राजनीतिक मूल्यों का बलिदान दिया गया है। दूसरे शब्दों में कहें तो उनकी हत्या की गई है और यह कहना कठिन है कि इस हत्या के लिये वास्तविक जिम्मेदार कौन है।

अंतिम चक्र में जिस प्रकार से भाजपा ने नैतिकता, संविधान और हिंदुत्व को किनारे रखकर सत्ता प्राप्त करने का दुस्साहस किया उसका दुष्परिणाम मंगलवार को सबके सामने आ गया।

 यह समझ से बिल्कुल परे है कि अपने आपको शतरंज का खिलाड़ी मानने वाले अमित शाह जैसे राजनीतिक धुरन्धर भी पटखनी खा गए। यह कैसी नासमझी है कि भाजपा कर्नाटक के नाटक से भी कुछ न समझ सकी। 
शरद पवार राजनीति के मंझे हुए खिलाड़ी हैं, उनसे बिना सलाह-मशविरा किये अजित पवार जैसा नौसिखिया उप-मुख्यमंत्री बना दिया गया। राकांपा शरद पवार की पार्टी है न कि अजित पवार की। 

इस खेल में सबसे ज्यादा नुकसान भाजपा को ही हुआ, वह अपने वजीर (देवेंद्र फडणवीस) को बचाने के चक्कर में शरद पवार के प्यादे (अजित पवार) से मात खा गई।  दूसरे दृष्टिकोण से देखें तो राकांपा ने अजित पवार को शिखंडी की तरह इस्तेमाल किया और उसकी आड़ लेकर भाजपा के भीष्म पितामह को मृत्यु शैय्या पर सुला दिया। सही मायने में भाजपा को न माया मिली न ही राम।

जहां तक प्रश्न शिवसेना का है तो उसने तो न सिर्फ लोकतांत्रिक वरन मानवीय मूल्यों और धार्मिक संवेदनाओं सहित जनभावनाओं को भी भयंकर ठेस पहुंचाई है। शिवसेना तो सही मायने में "शवसेना" बन गई है। अबू आजमी जैसे इस्लामिक राष्ट्र के पैरोकार और मुंबई ब्लास्ट के कथित आरोपियों से हाथ मिलाकर और कांग्रेस जैसी धुर हिन्दू विरोधी पार्टी के सामने घुटने टेककर उद्धव ठाकरे ने यह साबित कर दिया कि वह "दुर्योधन" से जरा भी कम नहीं हैं। 

इस पूरी राजनीतिक महाभारत में शरद पवार ने श्रीकृष्ण की ही भूमिका निभाई। वह एक ऐसे योद्धा रहे जिन्होंने बिना अस्त्र-शस्त्र उठाये बड़े-बड़े योद्धाओं को पटखनी दे दी।उन्होंने सही मायने में शह और मात का खेल खेला।

यह मानना ही पड़ेगा कि महाराष्ट्र की राजनीति में आज भी शरद पवार चाणक्य ही हैं, और उद्धव ठाकरे को मुख्यमंत्री बनाकर उन्होंने पूरी तरह से यह सिद्ध भी कर दिखाया। कांग्रेस की भूमिका तो केवल एक मूकदर्शक की ही रही। जिसने जीतने वाले को अपनी मौन स्वीकृति दे दी।

अब भाजपा के बुरे दिन प्रारम्भ हो गए हैं, क्योंकि न तो वह जनता में जाकर शिवसेना को नँगा कर सकती है और न ही किसी पार्टी से मिलकर सत्ता की मलाई चाट सकती है।
अब उसके पास एक हारे और थके हुए खिलाड़ी की तरह मैदान से बाहर बैठने के अलावा और कोई चारा भी नहीं है।

-पंडित मनोज चतुर्वेदी "शास्त्री"

मंगलवार, 26 नवंबर 2019

*अधिक पढालिखा हिन्दू अपने ही धर्म का विरोध क्यों करने लगता है*

दुनिया के किसी भी दूसरे धर्म का व्यक्ति जितना पढ़-लिखकर विद्वान बनता जाता है, वह उतना ही अधिक अपने धर्म के प्रति निष्ठावान और जागरूक होता जाता है। वह न स्वयं जागरूक होता है वरन अपने ही जैसे दूसरे लोगों को भी जागरूक करने का प्रयास करता है। वह अपने धर्म की तमाम अच्छाइयों को दुनिया-समाज के समक्ष लाने का प्रयास करता है और अपने धर्म में फैली बुराइयों को ढककर रखते हुए उन्हें स्वयं ही दूर करने का प्रयास करता है। 
किंतु इसके ठीक उलट हिन्दू धर्म के लोग जितना पढ़ते-लिखते रहते हैं, वह उतना ही अधिक अपने धर्म का विरोध करते हैं, वह न केवल अपने धर्मशास्त्रों और रीति-रिवाजों में बुराइयाँ ढूंढते हैं वरन उनको दुनिया-समाज के समक्ष लाकर उनका मख़ौल उड़ाने का कुत्सित प्रयास भी करते हैं। इतना ही परन्तु अपने महापुरुषों, पूर्वजों के बनाये हुए नियम-सिद्धान्तों में भी खोट निकालकर उन्हें गलत सिद्ध करने का षड्यंत्र भी लगातार रचते रहते हैं।
एक मुस्लिम व्यक्ति वामपंथी होते हुए भी नमाज़ और रोजा नहीं छोड़ता लेकिन एक हिन्दू यदि वामपंथी बन जाता है तो वह सर्वप्रथम अपनी संस्कृति और संस्कारों को ही भूल जाता है। 
आप किसी भी दूसरे धर्म के विषय में जरा सी भी टीका-टिप्पणी नहीं कर सकते परन्तु सनातन धर्म का मज़ाक बनाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ता, ऐसे लोगों का कोई विरोध नहीं किया जाता, बल्कि उन्हें प्रोत्साहित किया जाता है।
आप किसी भी मंदिर के पुरोहित, किसी मठ के मठाधीश, महंत अथवा साधु-संत पर टिप्पणियां कर  सकते हैं लेकिन क्या कभी आपने किसी मुल्ला-मौलवी, किसी चर्च के पादरी पर कोई टीका-टिप्पणी करने का प्रयास किया है, कभी करके देखिए तुरन्त गर्दन का नाप ले लिया जाएगा।
यहां यह कहने का आशय कदापि नहीं है कि आप किसी भी धर्मगुरु का अपमान करें बल्कि यह समझाने का प्रयास भर है कि आप अपने धर्मगुरुओं, विद्वानों का यथासम्भव सम्मान करने और करवाने का प्रयास कीजिये।
अपने सनातन धर्म के ज्ञान-विज्ञान को समझने और उसपर गहनता से विचार करने का प्रयास करना ही चाहिए। 
यह हर पढ़ेलिखे व्यक्ति का दायित्व है कि वह अपने धर्म के प्रति न केवल स्वयं जागरूक हो बल्कि दूसरों को भी जागरूक करे।

-पंडित मनोज चतुर्वेदी शास्त्री

रविवार, 24 नवंबर 2019

मोहन भागवत या मोदी कोई ईश्वरीय अवतार नहीं हैं

मैं बड़ी विनम्रता किंतु दृढ़तापूर्वक कहना चाहता हूं कि प्रत्येक हिन्दू समाज के व्यक्ति को यह समझना चाहिए कि प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी और संघ संचालक परम् आदरणीय श्री मोहन भागवत कोई ईश्वरीय अवतार नहीं हैं, बल्कि हमारी-आपकी तरह से एक साधारण मनुष्य ही तो हैं। भाजपा कोई देवताओं की सभा नहीं है और न ही स्वयं सेवक संघ को ऋषि-मुनियों की मंडली माना जा सकता है।
अतः हमारा धर्म, हमारी आस्था और धर्मशास्त्रों को कौन पढ़ाएगा, उसका ज्ञान कौन देगा और उसपर शास्त्रार्थ करने की अनुमति किसको दी जा सकती है, इसपर निर्णय करने का पूरा अधिकार हम सभी सनातनभक्तों और वैदिक लोगों को है। यह अधिकार किसी राजनीतिक संगठन अथवा किसी संगठन विशेष को नहीं दिया जा सकता।
हमारे वेदों, उपनिषदों, संस्कारों, कर्मकांडों, हमारी संस्कृति और हमारे रीति-रिवाजों के विषय में उपदेश करने का अधिकार केवल और केवल उसी व्यक्ति को दिया जा सकता है जो हमारे धर्म का है, जिसने वेदों को न केवल पढ़ा है अपितु उसकी शिक्षा-दीक्षा को ह्रदय से अंगीकार किया है।
वह प्रत्येक व्यक्ति जो गायत्री मंत्र को न केवल पढ़ना जानता है बल्कि गायत्री मंत्र का प्रतिदिन ह्रदय से शुद्धता के साथ उच्चारण भी करता है और उसके भाव को ह्रदय से स्वीकार करता है, जो व्यक्ति हमारे धर्म को धारण करता है वही और केवल वही व्यक्ति इस योग्य माना जा सकता है कि वह हमारी वर्तमान और भावी पीढ़ी को  वेद, पुराण, उपनिषद, श्रीमद गीता और हमारे अन्य समस्त धर्मशास्त्रों का ज्ञान-उपदेश कर सके।

यह कदापि स्वीकार करने योग्य नहीं हो सकता कि हम केवल राजनीतिक हितों को साधने और निज स्वार्थों की पूर्ति हेतु अपने धर्म, अपनी सभ्यता, अपने विश्वास, अपने पूर्वजों के नियम-सिद्धान्तों, अपने संस्कारों और अपनी मान्यताओं की उपेक्षा करने लगें, उनका तिरस्कार करने लगें।

सत्ता के माध्यम से धर्म को बढ़ाने और धार्मिक ज्ञान को विस्तारित करने का प्रयास किया जाना चाहिए, उसे नष्ट-भ्रष्ट करने का कुप्रयास अथवा षड्यंत्र नहीं रचना चाहिए।

ॐ धर्मो रक्षति रक्षितः का मूल मंत्र सदैव स्मरण रखना चाहिए।

लेखक-पण्डित मनोज चतुर्वेदी "शास्त्री"