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मंगलवार, 29 अक्टूबर 2019

आई एस का चीफ भले ही मारा गया हो लेकिन इस्लामिक स्टेट की सोच अभी भी जिंदा है

एक फ़िल्म थी "सरकार", इस फ़िल्म में एक डायलॉग था, "आदमी को मारने से पहले उसकी सोच को मारना चाहिए". अमेरिका दुनिया के सबसे खूंखार और वहशी आतंकी अबू बकर अल बगदादी को सीरिया में मार गिराए जानेे का दावा किया है। इससे पहले अमेरिका ने अपने समय के सबसे खूंखार आतंकी ओसामा बिन लादेेन को भी मार गिरानेे के सबूत दिए थे।
लेकिन महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या इस सबके बावजूद यह दावा किया जा सकता है कि दुनिया से आतंकवाद और आतंकियों का पूरी तरह से खात्मा हो गया है? क्या यह मान लिया जाए कि इस्लामिक स्टेट के सरगना के मरने का बाद इस्लामिक स्टेट का सपना देखने वालों का भी अंत हो गया है?
इन सवालों का जवाब अभी किसी के पास नहीं है, सच तो यह है कि अमेरिका खुद दोहरी नीति अपना रहा है। जहां वह एक तरफ बगदादी और लादेन को मारने की मुहिम चलाता है तो दूसरी तरफ़ तालिबान के सरगनाओं से समझौता करने के लिए जीभ लपलपाता है। एक तरफ़ इस्लामिक स्टेट की सोच को ख़त्म करने पर जोर देता है तो वहीं दूसरी ओर तालिबानी सोच को बढ़ावा देता है।
अमेरिका की यह दोहरी नीति हमेशा से रही है और इसीलिए वह नरेंद्र मोदी से हाथ मिलाता है तो इमरान से गले मिलता है। वह कश्मीर पर भी लगातार दोहरी नीति अपनाए हुए है। ओसामा और बगदादी सही मायने में अमेरिका के लिए सरदर्द बन गए थे। वह दोनों अमेरिका की दादागिरी को खुलेआम चुनौती दे रहे थे, इसलिए उन्हें मारना अमेरिका के लिये जरूरी हो गया था।
लेकिन आतंकी सोच और इस्लामिक स्टेट की विचारधारा को अमेरिका अभी तक नहीं खत्म कर पाया है और न ही उसको ख़त्म करने के लिए वह प्रयत्नशील है।
भारत मेें भी बदरूद्दीन अजमल जैसी विचारधारा के लोग विषवमन करते घूूूम रहे हैैं, जो इस्लाम की आड़ में अपनी विनाशकारी सोच को बढ़ावा देेनेे में लगे हैैं। यह वही लोग हैैं जो इस्लामिक स्टेट और जिहाद की आड़ में विकास को विनाश में बदलना चाहते हैं। यह वही लोग हैं जो ज़ुबानी आतंकवाद को बढ़ावा देते हैं।
भारत की बढ़ती जनसंख्या निश्चित रूप से विकास में सबसे बड़ी बाधा है लेकिन इसको जानने और समझने के बावजूद इस्लामिक स्टेट की विचारधारा वाले लोग जनसंख्या नियंत्रण की नीति का घोर विरोध करते रहे हैं।
क्या ऐसी विचारधारा पर अंकुश लगाने में कोई "अमेरिका" कभी कामयाब हो पायेगा? शायद इस सवाल का जवाब खुद अमेरिका के पास भी नहीं है।

रविवार, 20 अक्टूबर 2019

“भगवा आतंकवाद” शब्द को गढ़ने वाले किसी गहरी साजिश को रच रहे हैं



हुतात्मा कमलेश तिवारी वीरगति को प्राप्त हो गए लेकिन उनकी हत्या जिस प्रकार से की गई बताई जाती है उससे एक बात बेहद स्पष्ट हो चुकी है कि “भगवा आतंकवाद” शब्द को गढ़ने वाले किसी गहरी साजिश को रच रहे हैं. मिडिया के द्वारा जिस प्रकार से यह बात सामने आ रही है कि कमलेश तिवारी के हत्यारों ने हत्या के समय भगवा वस्त्र पहने हुए थे उससे कहीं न कहीं इस बात को बल अवश्य मिलता है कि हिंदुत्व और भगवा को रात-दिन कोसने वाले लोगों के मंसूबे अच्छे नहीं हैं. इस हत्याकाण्ड के बाद यह भी सिध्द हो चला है कि आजकल हर भगवाधारी साधू नहीं होता बल्कि कुछ शैतान भी भगवा चोला पहनकर इस देश के माहौल को बिगाड़ने में लगे हैं. यह शैतान केवल हिन्दू और हिंदुत्व के ही नहीं बल्कि पुरे देश के दुश्मन हैं. जिस प्रकार भेड़ की खाल में भेड़िया अपने को छुपा लेता है ठीक वैसे ही अजमल कसाब ने अपने हाथ में कलावा पहनकर और कमलेश तिवारी के हत्यारों ने भगवा वस्त्रों को धारण कर जो जघन्य अपराध किये हैं और हिन्दू संस्कृति के प्रतीकों को अपवित्र करने और उन्हें बदनाम करने का जो घिनौना अपराध किया है उसे किसी भी दृष्टिकोण से उचित नहीं ठहराया जा सकता. भेड़ की खाल में छुपे ये भेड़िये न केवल हमारे समाज बल्कि पुरे देश के साम्प्रदायिक सौहार्द, शांति और सुरक्षा के लिए घातक हैं. ये आस्तीन में छुपे हुए वह सांप हैं जिनको कुचलना ही श्रेयस्कर होगा.

 सर्वे सन्तु सुखिनः और वसुधैव कुटुम्बकम् जैसे सिद्धांतों को अपनाने वाली भारतीय संस्कृति और सभ्यता ने कभी आतंकवाद और तलवार का सहारा नहीं लिया लेकिन जिन लोगों का मकसद ही पुरे विश्व में आतंक फैलाना है उनसे आप शांति की अपेक्षा नहीं कर सकते हैं. दरअसल भगवा में आतंकवाद नहीं है बल्कि आतंकवादियों ने भगवा चोले को अपना लिया है. आतंकवादी तो आज भी वही हैं जो कल थे लेकिन आजकल उन्होंने तिलक, कलावा और भगवा पहनना शुरू कर दिया है.

कुछ लोग सोशल मिडिया के जरिये यह साबित करने पर तुले हैं कि कमलेश तिवारी की हत्या के पीछे कोई व्यक्तिगत रंजिश का मामला है. दरअसल यह वही लोग हैं जो तबरेज अंसारी और अशफाक के मारे जाने के के पीछे एक धर्म विशेष को दोषी ठहराते हैं लेकिन जब भी किसी कमलेश तिवारी या किसी पाल की सपरिवार हत्या होती है तब इन्हें उसमें केवल व्यक्तिगत रंजिश ही नजर आती है. प्रदेश सरकार का यह दायित्व है कि वह इस हत्याकांड के पीछे क्या साजिश है यह पता लगाये.
अपने आप को धर्मगुरु बताने वाले उन लोगों को भी सख्त सजा मिलनी चाहिए जिन लोगों ने कमलेश तिवारी की गर्दन काटने का फरमान सुनाया और उसके लिए करोड़ो रूपये का लालच देकर अपराध को बढ़ावा देने व उकसाने का घ्रणित प्रयास भी किया था, साथ ही उन सभी लोगों को भी जिन्होंने इस जघन्य हत्याकांड में परोक्ष अथवा अपरोक्ष रूप से अपनी भागीदारी दी है सख्त से सख्त सजा मिलनी ही चाहिए. यही हुतात्मा कमलेश तिवारी को हमारी सच्ची एवं भावभीनी श्रधान्जली होगी, उनकी पवित्र आत्मा को शांति देने का एकमात्र उपाय यही है. 

शनिवार, 19 अक्टूबर 2019

आज कमलेश तिवारी, कल किसकी बारी: छद्म सेकुलरिज्म की अग्नि में मां भारती के सच्चे सपूतों की यह आहुति कब तक दी जाती रहेगी


धन्य है वह मां जिसकी कोख से कमलेश तिवारी जैसा मां भारती का लाल पैदा हुआ और कोटि-कोटि नमन है उस पिता को जिसके ओज से हिंदुत्व के सच्चे और निर्भीक एक ऐसे सपूत का जन्म हुआ जिसने सनातन संस्कृति और सभ्यता की रक्षा और मान के लिए अपने प्राण तक न्योछावर कर दिए. 


श्रधेय स्वामी श्रद्धानंद के अमर बलिदान के पश्चात कमलेश तिवारी का यह बलिदान सनातन समाज के इतिहास में सदा-सदा के लिए स्वर्ण अक्षरों में अंकित हो गया है. लेकिन अहो दुर्भाग्य, कि इतने महान बलिदानों के पश्चात् भी हमारा सनातन समाज कुंभकर्ण की नींद सोया हुआ है. न जाने कितने निर्दोष संत और महात्माओं की बलि और होनी शेष है, न जाने कितने घरों के चिराग अभी और बुझने हैं, यह तो परमात्मा ही भली प्रकार जानता है. क्या हमारी नींद अभी भी नहीं खुलेगी, क्या अब भी हम चैन की नींद सोते रहेंगे. आखिर कितने श्रध्दानन्द, कितने कमलेश तिवारी हिंदुत्व की रक्षा के लिए अपने प्राण न्योछावर करेंगे और कब तक? यह एक यक्ष प्रश्न है. जिसका उत्तर हमें स्वयं तलाशना होगा.

 गले में सेक्युलरिज्म का ढोल लटकाए एक बाइक चोर के मरने पर मॉबलिंचिंग की आड़ में खुलेआम सडकों पर उपद्रव मचाने वाले, भारत को असहिष्णु बताने वाले, देश-विदेश में भारतीय संस्कृति और सभ्यता का मजाक बनाने वाले, अब मौनव्रत धारण क्यों किये बैठे हैं? क्या सिर्फ इसलिये कि मरने वाला कमलेश तिवारी था, तबरेज अंसारी नहीं. हम किसी भी दृष्टिकोण से हुतात्मा कमलेश तिवारी के इस्लाम के पैगम्बर मुहम्मद साहब के विरुद्ध दिए गए तथाकथित बयान का समर्थन कदापि नहीं कर सकते, किन्तु इस प्रकार से किसी की हत्या करना कहाँ तक उचित ठहराया जा सकता है. जो लोग नाथूराम गोडसे को गाँधी की हत्या के लिए आज तक कोसते हैं वही लोग स्वामी श्रद्धानन्द और अब कमलेश तिवारी की हत्या पर चुप्पी क्यों साधे हैं? 

आपने एक गाँधी खोया है, हमने स्वामी श्रध्दानन्द, डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी, पंडित दीनदयाल उपाध्याय और अब कमलेश तिवारी सहित न जाने कितने मां भारती के लालों को असमय काल के गाल में समाते हुए देखा है. यह कैसी विडम्बना है कि हम अपने ही देश में, अपने ही घर में सुरक्षित नहीं हैं, यह कैसा दुर्भाग्य है कि हिंदूवादी सरकारों के होते हुए भी वहशी दरिन्दे हिंदुत्व के एक सच्चे सिपाही का दिनदहाड़े उसके ही घर में उसका गला रेत जाते हैं और हम सांप निकलने के बाद लकीर पीटने में लग जाते हैं.

हम सडकों पर आवारा घूमती हुई गायों की रक्षा के लिए तो बड़े-बड़े उपायों और दावों की बात करते हैं लेकिन सनातन संस्कृति, सभ्यता और विश्वास की रक्षा करने वालों को उनके ही घरों में सुरक्षा दे पाने में अपने आप को पूर्णतया असहज पा रहे हैं. छद्म सेकुलरिज्म की अग्नि में मां भारती के सच्चे सपूतों की यह आहुति कब तक दी जाती रहेगी, आखिर कब तक?