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गुरुवार, 31 मई 2018

अल्लामा इक़बाल पाकिस्तान की सबसे पहले सलाह देने वालों में से थे


मुहम्मद इकबाल का जन्म सन १८७३ ईसवी में और मृत्यु सन १९३८ ईसवी में हुई थी. वे सियालकोट पंजाब के रहने वाले थे. लाहौर से उन्होंने एम् ए किया. कैम्ब्रिज से उन्होंने दर्शन का अध्ययन किया एवं म्यूनिख से उन्होंने डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की. उनके डाक्टरेट का विषय “ईरानी रहस्यवाद” था. १९०८ ईसवी में वे भारत लौटे और लाहौर में उन्होंने अपनी बैरिस्टरी आरंभ की. सन १९२२ में उन्हें सरकार की ओर से “सर” का ख़िताब मिला. सन १९३० ईसवी में वे मुस्लिम लीग के लाहौर सत्र के अध्यक्ष चुने गए. सन १९२८-२९ ईसवी में मद्रास में उन्होंने इस्लाम पर छह बयान दिए. उन व्याख्यानों से प्रभावित होकर लार्ड इरविन ने उन्हें धर्म और दर्शन पर व्याख्यान देने को ऑक्सफोर्ड भिजवाया. ये व्याख्यान ही उनके गद लेख हैं बाकि जो कुछ उन्होंने कहा वो केवल कविताओं में ही कहा. जवाहर लाल नेहरु ने अपने ग्रन्थ “हिदुस्तान की कहानी” में लिखा है कि “इकबाल पाकिस्तान की सबसे पहले सलाह देने वालों में से थे. फिर भी ऐसा मालूम होता था कि उन्होंने उसके जन्मजात खतरे और उसके निकम्मेपन को पहले ही भांप लिया था.” एडवर्ड टामसन ने लिखा है कि बातचीत के सिलसिले में इकबाल ने उन्हें बतलाया था कि उन्होंने मुस्लिम लीग के अधिवेशन के सभापति होने के नाते पाकिस्तान की सलाह दी थी. लेकिन उन्हें इस बात का यकीन था कि पाकिस्तान कुल मिलाकर सारे हिंदुस्तान के ही लिए, खासतौर पर मुसलमानों के लिए घातक होगी.
१९३० ईसवी में मुस्लिम लीग के इलाहाबाद अधिवेशन में कहा था-“ मैं ये देखना पसंद करूंगा कि पंजाब, पश्चिमोत्तर सीमा प्रान्त, सिंध और बलूचिस्तान को मिलाकर एक राज्य बना दिया जाये. पश्चिमोत्तर मुसलमान राज्य ही मुझे मुसलमानों की अंतिम मंजिल लगती है”. मुहम्मद इकबाल ने हिंदुस्तान के मुस्लिम बहुल क्षेत्रों को एक अलग राज्य का दर्जा देने के सलाह दी.
सुहैल जहीर लारी की “ए इस्लास्तरेट हिस्ट्री ऑफ़ सिंध” के नए संस्करण में ई.जे थामस नामक व्यक्ति को लिखे इकबाल के पत्र को प्रकाशित किया गया है. जिसमें इकबाल ने लिखा है- “मैंने एक गलती की है, जिसे मैं तुरंत बता दूं, क्योंकि मुझे लगता है कि यह काफी गम्भीर है. मुझे पाकिस्तान नाम की योजना का कर्णधार बताया जा रहा है. पाकिस्तान मेरी योजना नहीं है. मैंने अपने सम्बोधन में ये सुझाव रखा था, वह एक मुस्लिम प्रान्त यानि प्रस्तावित भारतीय संघ के पश्चिमोत्तर हिस्से में, जहाँ मुस्लिमों की अधिक आबादी है, को देश का एक प्रान्त बनाने सम्बन्धी था.” 
  -आधुनिक भारत में साम्प्रदायिकता का जन्म    (भाग-३)
विशेष – यह लेख “भारत का राष्ट्रीय आन्दोलन” (ज्ञान सदन प्रकाशन) जिसके (लेखक मुकेश बरनवाल) की पुस्तक में से सम्पादित किये गए कुछ अंश पर आधारित है

बुधवार, 2 मई 2018

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी शासक पैदा करती है, गुलाम नहीं और जिन्ना शासक था

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में पाकिस्तान के क़ायदे आजम मौहम्मद अली जिन्ना की तस्वीर लगे होने को लेकर मचे घमासान के बीच भाजपा के स्वामी प्रसाद मौर्य ने बयान दिया है कि "जिन महापुरुषों का योगदान इस राष्ट्र के निर्माण में रहा है, यदि उनपर कोई उंगली उठाता है तो यह घटिया बात है। देश के बंटवारे से पहले जिन्ना का योगदान भी इस देश में था।"
इस बयान को देकर स्वामी प्रसाद मौर्य ने यह साबित कर दिया है कि सत्ता के लोभ में भले ही उन्होंने भाजपा को अपना लिया हो किन्तु वो अपनी विचारधारा और मानसिकता को नहीं बदल पाए।
कोई भी बयान या सवाल उठाने से पहले ये जानना जरूरी है कि अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी और जिन्ना का सम्बन्ध क्या है। इसको जानने के लिए हमें इतिहास में झांकने की जरूरत है।
अंग्रेजों से पहले इस देश में मुगलों का शासन था। लेकिन अंग्रेजों ने आकर यहां पर अपना राज स्थापित कर लिया, इसके लिए अंग्रेजों ने उन भारतीयों का सहारा लिया जो मुगल शासन के ख़िलाफ़ थे। *राजनीति में शासक का विरोध शासक ही करता है, प्रजा कभी विरोध नहीं करती, क्योंकि प्रजा कभी शासन नहीं कर सकती।*
मुगलों से पहले जो शासक थे उन्हीं के वंशज मुगलों के प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से विरोधी थे। ये लोग किसी जाति या संप्रदाय विशेष के नहीं थे बल्कि ये सब या इनके पूर्वज कभी न कभी इस देश के शासक थे।
अंग्रेजों ने इन्हीं लोगों का सहारा लेकर इस देश से मुगल शासन  का अंत किया।
किन्तु धीरे-धीरे अंग्रेजों ने इन लोगों को भी किनारे करना शुरू कर दिया। अब समस्या फिर वहीं खड़ी हो गई जहां से चली थी। कुछ लोगों ने अब हालात से समझौते कर लिए लेकिन बाकी लोगों ने अभी भी हिम्मत नहीं हारी थी और वो लोग फिर से आजादी के लिए लड़ने लगे और *इन शासक प्रवत्ति के लोगों को अंग्रेजों ने एक जगह, एक प्लेटफॉर्म पर खड़ा कर दिया और इस प्लेटफॉर्म का नाम था कांग्रेस।* बाद में ये कांग्रेस दो धड़ों में बंट गई जिसमें एक धड़ा उन लोगों का था जो सत्ता में रहकर भी सत्ता के विरोधी थे और दूसरे वो जो सत्ता का उपभोग करने के लिए ही सत्ता से जुड़े थे।
जिन्ना, गांधी, नेहरू जैसे लोग उन्हीं में से थे जो सिर्फ सत्ताभोगी थे। जबकि पटेल, सुभाष चन्द्र बोस जैसे नेता सत्ता में रहकर भी सत्ताधिकारी के विरोधी थे।
बहरहाल द्वितीय विश्वयुध्द में जर्मनी के हिटलर जैसे नेताओं ने अंग्रेजी सम्राज्य की जड़ें हिला दीं और अंग्रेजों ने इस देश को छोड़ने में ही भलाई समझी। अंग्रेजों के  जाते ही उन लोगों में सत्ताभोगी कीड़े फिर से कुलबुलाने लगे जिन्हें सिर्फ सत्ता का भोग करना था। और उन्होंने अंग्रेजों की हर शर्त को स्वीकार कर लिया। अंग्रेज जानता था कि मुगल शासक और मुगलों से पहले जो लोग शासन करते थे वो लोग फिर से शासन के लिए लड़ेंगे।। और वही हुआ भी जिन्ना और नेहरू जैसे नेताओं में फिर टकराव शुरू हो गया।
*मुस्लिम नेताओं ने अंग्रेजों को इसलिए नहीं भगाया था क्योंकि उन्हें देश को वापस उन्हीं को सौंप देना था जिनसे उनके मुगल वंशजों ने छीना था और हिन्दू नेताओं ने भी अंग्रेजों से लड़ाई इसलिए नहीं लड़ी थी कि वो हाथ में आई हुई सत्ता को फिर से मुगलों के हाथ में सौंप देंगे।*
यही सच्चाई है आज़ादी की लड़ाई की। अंग्रेजों से *इस देश को आजाद कराने में किसी जिन्ना, नेहरू या गांधी का कोई हाथ नहीं है बल्कि वास्तव में उस आम आदमी का हाथ है जिसने हमेशा ग़ुलामी ही सही और आज भी गुलाम है।* भगतसिंह, राजगुरु, सुखदेव, सुभाषचंद्र बोस, चंद्रशेखर आजाद, बिरसी मुंडा, उधमसिंह, रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाकउल्ला खान जैसे न जाने कितने लोग हैं जिन्होंने हंसते-हंसते अपनी जान कुर्बान कर दी, आज उन्हें कोई जानता भी नहीं और न ही उनके परिवार को जानना चाहता है।
*अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी जिन्ना जैसे शासक और प्रशासक तैयार करती है। खुद संघ भी शासक-प्रशासक ही तैयार करता है।*
इसलिये अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में जिन्ना की ही तस्वीर लगेगी। *कांग्रेस खुद एक यूनिवर्सिटी है जो केवल सत्ताधिकारी को जन्म देती है।*
अंतर केवल विचारधारा का है, आदर्शों का है। जिसका जो आदर्श है उसकी तसवीर भी वही लगाएगा। *अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी कभी वीर सावरकर को आदर्श नहीं मान सकती और बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी कभी जिन्ना को आदर्श नहीं मान सकती।*
अंतिम सत्य ये है कि सत्ताधिकारी हमेशा सत्ता चाहता है क्योंकि सत्ता उसके खून में होती है, उनके डीएनए में होता है।
*जिन्ना सत्ताधिकारी थे और पाकिस्तान उस सत्ता की देन था।।*
अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में पढ़ने वाला शासक प्रवत्ति की मानसिकता लेकर बाहर आता है, वो कभी गुलाम नहीं बन सकता। बस जिन्ना उसी शासकीय विचारधारा की तसवीर है जिसे यूनिवर्सिटी में लगा रहने का पूरा हक है, जो ज़हन में हो उसकी ही तस्वीर लगाई जाती है।
*-मनोज चतुर्वेदी शास्त्री*
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